Tuesday, 28 January 2014

योग्यता से मजदूरी मिलती है।
 कृपा योग्यता  से प्राप्त नहीं होती।  भीख भी योग्यता से नहीं मिलती ,दीनता पर मिलती है , वह भी   गिड़गिड़ाने ,नाक रगड़ने से मिलती है।
 मजदूरी के हकदार लड़ कर मजदूरी लेने के अभ्यस्त हो चुके होते है  अतः वे जहाँ भीख मिला करती है वहाँ मिसफिट हो जाते है। ,हाथ फैला कर  कुछ मांगना उनकी फितरत में नहीं ,फिर चाहे भीख में राज्य ही क्यों न मिल रहा हो।
योग्य होने का यह बड़ा नुकसान है कि कृपा प्राप्त करने की कला आदमी सीख  ही नहीं पाता ,और कृपा वाले क्षेत्र की उपलब्धियों से अक्सर दूर ही रह जाता है।
शायद योग्य ब्यक्ति स्वाभिमान के नाम पर बलिदान हो जाया करता है।
योग्य होने से उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होता ,वह तो उत्तराधिकारी होने से ही प्राप्त होगा चाहे आप कैसे भी हो। इसी प्रकार दान किसी की दया से ही प्राप्त हो सकता है ,केवल पात्र होने से नहीं।
आपका स्वाभिमान दूसरे समर्थ लोगों को एक चुनौती भी तो देता है , अहं का टकराव पैदा करता है।
कृपा प्राप्त करने के लिये समर्पण की आवश्यकता होती है  और समर्पण करना सभी के बस की बात तो है नहीं।
कृपा या दान के लिए लॉयल्टी  पहली शर्त है। योग्य होने से कुछ नहीं होता ,लॉयल होने से ही होता है। 

Sunday, 26 January 2014

क्या हम १८% के स्तर पर काम करने वाले समाज के अंग है?
क्या हमें ग्रेस मार्क से पास होने ,कर दिये जाने ,या पास कर देने आदि की स्थितियों से कोई बैचैनी  होती  है ?
हम किसी भी उपदेश या सजेसन को सहज शेयर करते हैं पर उस पर एक्ट अपॉन करने के प्रयास से भी असहज हो जाते हैं , क्यों ?
हम विदुर श्रेणी के योग्य लोगों को सलाहकार श्रेणी में ही रखने की मानसिकता में क्यों रहते हैं ,उन्हें निर्णय लेने ,कुछ करने का अधिकार देने को तैयार क्यों नहीं होते ?
हम धृतराष्ट्र ही क्यों राजा के रूप में कथा कहानी  के पात्र के रूप में खोज पते हैं।
बीरबल ,टोडरमल , विदुर  को हम केंद्र में क्यों नहीं रखते।
यथास्थितिवादी हैं क्या हम ?
वास्तविक परिवर्तन का आभास भी हमें  किसी अनजाने भय से ब्याकुल क्यों कर  देता है ?
थोड़ी भी अधिक क्षमता वाले व्यक्ति की हम पूजा क्यों करने लगते है ?
ऐसे लोगों को सामान्य समाज  में प्रतिष्ठा क्यों नहीं देते ? दे भी दें  तो उन्हें  व्यवस्था में केंद्रीय स्थान न दे    कर , परिधि में कहीं बैठने को विवश क्यों कर देते हैं। 
इतिहास बनते समय का साक्षी स्वयं नहीं जनता की वह इतिहास का गवाह बनने जा रहा है। इतिहास के न तो खेत दिखा करते हैं , न बीज। इतिहास बनाने वाले कुम्भकार का भी पता बाद में चलता है। इतिहास के खेतिहर ,या मजदूर  का भी पता बाद में ही चलता है। इतिहास में क्या दर्ज होगा क्या छाँट दिया जायेगा कोई नहीं कह सकता। इतिहास तो बस बनता चला जाता है,इसे कंट्रोल करना किसी के बस की बात नहीं है। 

Saturday, 25 January 2014

दिये का तो था इमान रौशनी। दिया न रहा ,तो कहाँ रौशनी। बुझा दिया ,तो कहाँ रौशनी।

आखिर दिया बुझ ही तो गया
देखो जरा ,दिया क्या ले गया।

सारी रौशनी कहाँ चली गयी
दिया चुरा तो नहीं ले गया।

बुझे दिए के सिरहाने खोजो
रौशनी छिपा तो नहीं गया।

जला दिया तभी थी रौशनी
जल चूका , तो कहाँ रौशनी।

दिये को तो तुमने बझाया
बुझा दिया ,तो कहाँ रौशनी।

रौशनी दिये में दिये से थी
दिया न रहा ,तो कहाँ रौशनी।

अँधेरा तुम्हारा निगाहें तुम्हारी
दिये का तो था इमान  रौशनी। 








   
यदि बेच ही नहीं सकते तुम अपने ईमान को
तो तुम जमाने के नंबरदारों के किस काम के।

जमाने को तो चाहिए , एक अदद खिलौना बेजान
सरे राह उतारी जा सके जिसकी आबरू,औ शान।

तुम्हारी आबरू, मान ,शान औ जान ,किस काम  के  
मुझे न सजा सके जो, न करे खिदमत ,किस काम के।


लाख इल्म ,ईमान या हुनर हो,जमाना जिक्र कब करता है 
,मतलब निकले जिससे,जमाना फ़िक्र उसी की करता है.  

सही नहीं सुविधा देखता है जमाना
जमाने का मिजाज ही ऐसा है
सही गलत की दुविधा देखता जमाना
इस सुविधा  -दुविधा का आगाज ही ऐसा है।

यही  तो  बवंडर फैला है चारों  और
पाप के दलदल में फंसा जाता जमाना
सिर झुका के खड़ा है पुण्य ,इंसाफ
तमाशा देखता मुंसिफ  और ये जमाना।

 मशरफ के हो या नहीं ,टटोलता जमाना
मेरी आबरू की पर्त यूँ खोलता जमाना
नीलाम मुझे  करता रहा बेदर्द जमाना
मेरी कीमत यूँ बढ़ती रही , देखता रहा जमाना।

खरीददारों  की औकात कम पड़ने लगी
निर्लज्ज जमाना कब तक ठहरता , हुआ बेजोश 
बेईमान आँखे , बेअदब हाथ , खुदगर्ज जमाना
आखिर खुदी के सामने  खोने लगे  होश