Sunday, 29 December 2024

 यह समय हम सबों के लिए ईमानदारी पूर्वक आत्म निरीक्षण का है कि इस समाप्त होते वर्ष में हम ने क्या किया और अपने कर्मों से क्या पाया और क्या खोया ताकि नए वर्ष को अधिकाधिक अच्छा बनाया जा सके। 

मैं जानता हूॅं कि ईमानदार आत्मनिरीक्षण बहुत ही कठिन कार्य है क्योंकि कोई भी व्यक्ति जान-बूझकर गलती नही करता है वल्कि फायदा के लिए अपनी समझ से जो उचित लगता है वहीं कार्य करता है। 

बस, ऐसे कार्यों का ही मुल्यांकन करना है। 

यह सच है कि यदि अपवाद को छोड़ दें तो मनुष्य स्वभावत: स्वार्थी होता है और अनुचित लाभ के लिए गलत काम कर बैठता है जो देर-सवेर विवाद पैदा कर देता है जिसके परिणामस्वरूप वह तनावग्रस्त हो जाता है तथा जितना वह प्राप्त करता है उससे ज्यादा वह गंवा देता है। 

इसलिए मैं हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी अपने सभी रिश्तेदारों और संपर्कियों से आग्रह करता हूॅं कि वे स्थिर मन से बीत रहे पूरे वर्ष में अपने कार्यों का लेखा-जोखा कर नव वर्ष में इस संकल्प के साथ प्रवेश करें कि वे तुक्ष प्राप्ति के लिए कोई अनुचित कार्य नही करेंगे तथा अश्लीलता, उद्दंडता एवं अनुशासनहीनता का त्याग कर खुशहाल जीवन व्यतीत करने का प्रयास करेंगे।

Friday, 20 December 2024

 मोदी मोदी मोदी - सारी दुनिया मानो - मोदी जी से परेशान है ... मानो तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो सारा दोष - मोदी जी पर ही डाला जाएगा । सिर्फ राहुल परेशान नहीं है .. अमरीका .. चीन ..पाकिस्तान .. फिलिस्तीन .. जस्टिन ट्रूडो ..जॉर्ज सोरेस .. हमास ..आईएसआई .. खालिस्तानी .. आतंकवादी ..केजरी .. ममता .. अखिलेश ..लालू-भालू .. फारुख .. पूरा विपक्ष परेशान .....

बहुत लंबी लिस्ट है .. गिनती खतम ही नहीं होगी । .. ये आदमी है - या बवाल ..

और तो और ......गमलों में दो - दो करोड की गोभी उगाने वाले होनहार किसान भी परेशान .... मोदी नहीं था ...तो गमलों में भी दो करोड़ की गोभी उग जाती थी । अब वही होनहार गरीब किसान भी काजू-पिस्ता खाकर दिल्ली में सडक पर आंदोलन कर रहा है --

राहुल की थाईलैंड यात्रा बंद .... उनके जीजा का जमीन का कारोबार बंद ...माताजी की गुप्त मेडिकल यात्रा बन्द ...

सेना के जवानों पर पत्थर फेकने वाले परेशान है । कहां तो पत्थर फेकने के 500 रूपए मिलते थे ... अब गोलियां खानी पड रही है ।

पाकिस्तानी आंतकवादी भी आराम से कश्मीर घूमने आ जाते थे । एक बार तो - मुम्बई तक भी आ गए थे । अब हालात यह है कि अज्ञात लोग के निशाने पर खुद आतंकवादी है । उनको अपने ही घर से निकलने के लिए भी सोचना पड रहा है ।

नेहरू जी ने तो समय रहते - अपने हाथ से अपने गले में - मेडल डाल कर अपना सम्मान कर लिया था । भरोसा नहीं था कि - शायद बाद मे सम्मान शायद ना मिले । पर मोदी जी को अब तक 18 विदेशी " सर्वोच्च नागरिक सम्मान " मिल चुके हैं -- अब मोदी जी में पता नहीं सबको क्या दिखता है ??

इससे तो मनमोहन सिंह जी ठीक थे । किसी सम्मान का लालच नहीं था । खुद राहुल भी अगर सम्मान नहीं करें तो भी कुछ नहीं बोलते थे । जो बाहर से राष्ट्राध्यक्ष आते थे , वो भी मनमोहन जी को समझा कर जाते थे ..अब समझाते थे - या धमकाते थे - यह तो वही जाने ।

पाकिस्तान आराम से आतंकवादी भेजकर आंखें दिखाता था । पता था, मौनी बाबा फिर भी शान्ति प्रस्ताव ही भेजेगा । कश्मीर के नौजवानों को सेना पर पत्थर फेकने की आजादी थी । आजादी तो मानो भगतसिंह उनके लिए ही ले कर लाए थे ।

बहुत ही साहसिक फैसला मोदी जी ने लिया - जैसे .....

नोट बंदी भारत में करवा कर और आटे की लाइनें पाकिस्तान में लगवा दी । भारतवासियों को भले ही नोट बंदी समझ में ना आई हो पर पाकिस्तान को तो बहुत अच्छा समझ में आई । आतंकवादियों को पगार देना भारी पड़ने लगा ।

एक बात तो - मेरी समझ के भी बाहर है ।

जैसे यहां के मुसलमानो को मोदी बिल्कुल पसंद नहीं --- पर पाकिस्तानी मुसलमान कहते हैं -- काश हमें मोदी जैसा नेता मिला होता ।

पाकिस्तानी मानते हैं कि मोदी ने हिंदूओं के लिए बहुत कुछ किया है । पर यहां के हिंदू कहते हैं मोदी जी ने हमारे लिए कुछ नहीं किया ।

अब बताओ -- मैं किस पर विश्वास करूं

आजादी के बाद 70 साल‌ से हमारे अपने देश में -- हमारे भगवान का मन्दिर नहीं था -- वो भी बना -- और स्थापना का सौभाग्य मोदी जी के हाथ में था । तो कई लोगों का जलना स्वाभाविक है ।

नया संसद भवन अपने कार्यकाल मे बनवाया -- तो जलन और बढ गई । इतनी बढ गई कि विपक्ष ने संसद भवन के प्रवेश समारोह का ही बहिष्कार कर दिया ।

सभी को लगता था कि कश्मीर से धारा 370 - कभी नहीं हट सकती । फारूख खुलेआम कहता था .... अगर 370 को हाथ लगाया तो कोई भारत का झंडा फहराने वाला कोई हाथ नहीं मिलेगा । पर झंडा भी लगा -- और झंडा फहराने वाले हाथ भी मिले । पाकिस्तान बिलबिला कर रह गया -- यूनाइटेड नेशंस भी कुछ नहीं कर पाया ।

1400 साल पुराने तीन तलाक के कानून को खत्म कराया । सोचा मुस्लिम औरतें बहुत खुश होंगी और मोदी को भर भर कर वोट मिलेंगे -- पर नहीं -- राहुल ने 8500 का झूठा लालच देकर दिखा दिया -- कि देखो -- कैसे कांग्रेस इस कौम को 70 साल से बेवकूफ बना रही है -- यह काम तो कांग्रेस बिना कुछ दिए भी करवा सकती है ।

राष्ट्रपति पद पर माननीय द्रोपदी मुर्मू को सम्मानपूर्वक आसीन किया कि लोगों मे विश्वास जगे कि -- मोदी जी देश के अंतिम पंक्ति में बैठने वाले लोगों का भी विशेष ध्यान रखते हैं । पर फिर भी कुछ लोग राहुल के झूठे बहकावे में आ गए । वरना जिस कांग्रेस पार्टी ने उनकी 60 साल में सुद नहीं ली । जिनके विकास के बिल " मंडल कमीशन बिल " को कांग्रेस ने रोका । उनको भ्रमित करके , कांग्रेस सत्ता में वापसी का सपना देख रही है ।

भूल तो 1984 के दंगों को सिख कौम भी गई । मानो उन्होंने स्वीकार कर लिया -- कि " बड़ा पेड़ जब गिरता है तो धरती तो हिलती है " इस एक लाइन के बयान से हजारों लोगों का खून माफ करवा लिया गया ।

अंत में , मैं इतना ही कि मोदी जी की देश भक्ति अतुलनीय है - निःसंदेह है ।




मुझे लगता था कि प्रबुद्ध वर्ग में मात्र गिने-चुने परिवार में ही अनुशासनहीनता आई है लेकिन संसद परिसर में घटित कल की घटना यह दर्शाती है कि अनुशासनहीनता अब राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है। किसी भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कोई व्यक्ति या दल के लिए आवश्यक नही कि वही सरकार बनावे। ऐसी सोंच प्रजातंत्र की नही वल्कि तानाशाह की होती है। यह सही है कि जिस दल ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर भारत को गुलामी से मुक्ति दिलाने हेतु काम किया वह कांग्रेस पार्टी थी। कांग्रेस का सत्याग्रह और आजादी के दीवाने  क्रांतिकारियों के क्रांति का संयुक्त प्रतिफल था जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने हेतु मजबूर किया। लेकिन आजादी के बाद क्रांतिकारियों को कभी पदलोलुप्ता नहीं रही और कांग्रेस पार्टी निर्वाध स्वतंत्र भारत में सरकार बना ली। उस समय कांग्रेसियों को सपने में भी ऐसा विश्वास नही था कि एक दिन कोई दूसरी पार्टी भी सरकार बना सकती है जिस कारण सरकार बनाने का अधिकार कांग्रेस पार्टी सिर्फ अपना समझने लगी थी लेकिन ऐसा हो न सका और धीरे धीरे सरकार गठन का काम कांग्रेस के हाथ से फिसलकर अन्य दलों के हाथ में चली गई जो अब कांग्रेसियों को पच नही रही है और येन-तेन-प्रकारेण सरकार बनाने के लिए वे कार्यरत प्रतिपक्ष को काम नही करने देने के उद्देश्य से तरह तरह के व्यवधान खड़ी करते रहते हैं। फिर भी जब उनकी दाल नही गली तो वे अब उद्दंडता पर उतर गए जिसका प्रमाण कल देखने को मिला। सभी उद्दंडों का यही ध्येय होता है कि वह अपने बाहुबल के सहारे दूसरों का अधिकार हनन करें। यही कारण है कि कल राहुल की अगुवाई में कांग्रेसियों ने प्रतिपक्ष के दो सांसदों को घायल कर दिया तथा एक महिला सांसद के साथ दुर्व्यवहार किया। भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में इस तरह की घटना घटित होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस तरह किसी उद्दंड को सही मार्ग पर लाने के लिए प्रारंभ में ही उसका हाथ-पांव तोड़ कर सबक सिखाने की आवश्यकता है उसी प्रकार स्वस्थ्य प्रजातांत्रिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उद्दंड नेतागण एवं उनके दल को चुनाव में मटियामेट करने की आवश्यकता है। भारत की जनता अब जागरूक हो गई है और वह सब जानती है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि जो नेता या दल बाहुबल के सहारे सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं उन्हें भारतीय मतदाता ऐसा सबक सिखाएंगे कि उन्हें अपना बोड़िया-विस्तर बांध कर भारत से पलायन करने हेतु विवश हो जाना पड़ेगा वरना---? ये भारत की पब्लिक है; सब जानती है, दूसरा रास्ता भी अपना सकती है।

    "उद्दंडों के लिए बस एक ही सजा,

      हाथ-पांव तोड़ कर घर में बिठा।"

Friday, 13 December 2024

 जब-जब बढल बा ठंढ सियासत के गांव में

तापल गइल गरीब के मड़ई के जराइके


विश्वनाथ प्रसाद 'शैदा' जी के दू गो रचना कालजयी ह । अइसे त उहां के लिखल अनेकन गो गीतन के तासीर साहित्यिक रुप से अतना पोढ आ गोट ह जवनन के तुलना कवनो भाषा के कालजयी रचनन से हो सकेला बाकिर तबो उ दुनो रचना, पहिला - बतावs चांद केकरा से कहाँ मिले जालs; आ दुसरका रचना - खुदा के भी घर बे बोलवले ना जाई । दुसरका गजल ह बाकि ह बड़ा शानदार । करेजा खखोर के राखि देला । माने कहल जाला कि जब अनुभव रुपी पथर प जिनिगी रगराले घिसाले त उ रीठा हो जाले, ठीक ओइसहीं शैदा जी के उ गजल रीठा ह ।


पिछला कुछ समय से किताब पढे लिखे के छुटल रहल ह, काम के व्यस्तता तनि बेसी हो गइल बा एह वजह से किताब के लमहर बैकलाग हो गइल बा आ डॉ उदय नारायण तिवारी जी के किताब ' भोजपुरी भाषा और साहित्य' फेरु से अझुरा देले बिआ, जवना के रोज एक दू पैरा पढ रहल बानी । बाकिर तबो, एहि में ओ‌डी मारत किताब, पत्र-पत्रिका के पढाई हो जाला ।


भोजपुरी में एगो पत्रिका ह 'परास' लमहर समय ले इ पत्रिका आपन छाप, भोजपुरी भाषा आ साहित्य प छोड़ले बिआ आ एह पत्रिका के संपादक हईं डॉ आसिफ रोहतासवी जी । इहां के खुद एगो बड़ा शानदार आ निठाह गजल लेखक हईं । एहि 'परास' पत्रिका के अप्रैल-जून-2010 अंक के पढत रहनी ह । असल में इ अंक कानू सान्याल के समर्पित बड़ुवे बाकिर पत्रिका के पहिला पन्ना पलटते जगन्नाथ जी के लिखल दू गो गजल पढे के मिलल ह । अउरी बहुत कुछ पढे के मिली एह पत्रिका में बाकिर हमार अंगुरी एह 44 पेज के पत्रिका में पेज नम्बर 29 प जा के रुक गइल ह आ फेरु पढे के मिलल ह, शैदा जी लिखल गजल ( खुदा के घर) के तेवर के समानांतर चले वाला एगो गजल । 


एह गजल के लेखक बानी रामेश्वर प्रसाद सिन्हा 'पीयुष' जी ।


गजल के पढीं -


कतनो हिया में बात के राखी छिपाइके

तबहूँ निकल ऊ जात बा ओठन प आइके


लागल कि मन फुहार में भींजी गतर-गतर

केहू गइल उमेद के बदरी उड़ाइ के


जिनिगी भ जे अन्हार में घुट-घुटके मर गइल

राखल बा का मजार प दीया जराइके


जेकरा कउल प हमरा भरोसा रहे बहुत

अचके मुकर गइल बा ऊ मंदिर में जाइके


कइसे कहीं, लगाव ना उनुका ले रह गइल

रिस्ता टिकल बा दोस्त से दुश्मन प आइ के


जब-जब बढल बा ठंढ सियासत के गांव में

तापल गइल गरीब के मड़ई के जराइके


कइसन ह सुख सुराज के 'पीयुष' का कहीं

कुछ लोग लूट लेत बा तिकड़म भि‌डाइके


बहर कहीं मक्ता कहीं शेर कहीं जवन मन करे तवन कहीं बाकिर एह गजल के पढत घरी आ एकर माने बुझत घरी रउवा भोजपुरी भाषा आ साहित्य के तेवर के थाह लागी आ संगे संगे, एगो बिदेसी विधा में भोजपुरिया लेखनी के जबराट बाकिर मुलायम भाव रउवा सभ के पढे के मिली ।


परास पत्रिका के इ अंक भोजपुरी साहित्यांगन प लागल बा रउवा सभ एह अंक के ओजुगा से फोकट में डाउनलोड क के पढ सकेनी , अउरी बहुत कुछ बा ओह में जवनन के पढि के आपन विचार राखि सकेनी ।


एहि पत्रिका में कानू सान्याल प लिखत राजकमल चौधरी के एगो बड़ा शानदार हिंदी रचना के जिक्र बा जवन, हमरा निजी रुप से बड़ा जबरजस्त आ शानदार लागल । उ हिन्दी रचना ह -


आदमी को तोड़ती नही हैं लोकतांत्रिक पद्धतियाँ

केवल पेट के बल उसे झुका देती हैं

धीरे-धीरे अपाहिज

धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए

उसे शिष्ट राजभक्त

देशप्रेमी नागरिक बना लेती है

आदमी को इस लोकतंत्री संसार में

अलग हो जाना चाहिए ।


राजकमल जी के एह पंक्तियन के पढला के बाद अब एक हाली फेरु से रामेश्वर प्रसाद सिन्हा जी के उपर के गजल के अंतिम दू गो शेर के पढीं -


जब-जब बढल बा ठंढ सियासत के गांव में

तापल गइल गरीब के मड़ई के जराइके


कइसन ह सुख सुराज के 'पीयुष' का कहीं

कुछ लोग लूट लेत बा तिकड़म भि‌डाइके


भोजपुरी भाषा आ साहित्य के विकास खातिर, भोजपुरी में लिखत पढत रहीं । भोजपुरी, बड़हन भूभाग के भाषा ह एह से ओह बड़हन भूभाग प एह भाषा के तेवर आ ताव बना के राखे खातिर एह में लिखल पढल जरुरी बा ।


- नबीन कुमार

Sunday, 10 November 2024

 उन्हें बताओं वो दुनिया ख़रीद लाए हैं

जो बूढ़े बाप का चश्मा ख़रीद लाए हैं


वो अपने बेटों को बाईक दिलाने वालें थे 

सो हम भी बेटी का बस्ता ख़रीद लाए हैं


उसी का दर्द हमे मरहमो से प्यारा है

हम अपना बेच के जिसका ख़रीद लाए हैं


हमारे घर में अधेंरा नज़र नहीं आता 

ये चंद सिक्कों में हम क्या ख़रीद लाए हैं


ज़मीन बेचने वालों को ये नहीं मालूम

वो दरिया बेचके क़तरा ख़रीद लाए हैं


किताब लाए है हम अपने कुछ बुज़ुर्गों की 

हम अच्छे अच्छों से अच्छा ख़रीद लाए है 


किसी के हिज्र में आँसु बहाने वाले हम 

किसी से मिलने का सपना ख़रीद लाए हैं


Tuesday, 27 August 2024

 मित्रों,

 एक फिल्म है "चाइना गेट"।शायद आप सब लोगों ने ये फिल्म देखी होगी। इस फिल्म का एक सीन है, जब जगीरा डाकू अपने पूरे गिरोह के साथ देवदुर्ग गांव पर धावा बोल देता है। जगीरा गांव के बीचों-बीच खड़े होकर गांव के मुखिया को ललकार लगाता है कि वो कल तक जगीरा से जंग जारी रखने की बातें कर रहा था, अगर मुखिया के अंदर जरा सी भी हिम्मत है तो वो सामने आए और उससे मुकाबला करे।


उधर मुखिया हाथ मे एक कुल्हाड़ी लेकर जगीरा से भिड़ना चाहता है लेकिन उसकी पत्नी रोक देती है। इस बीच कुछ गांव वाले भी वहाँ आ जाते हैं और मुखिया को बताते हैं कि डाकुओं ने गांव को चारों तरफ से घेर लिया है। उधर जगीरा बार-बार मुखिया को ललकारता रहता है कि बाहर निकल और मुझसे मुकाबला कर। काफी समय तक जब मुखिया बाहर नहीं निकलता तो जगीरा धमकी देता है कि अगर मुखिया बाहर नहीं निकला तो वो गांव की औरतों और बच्चों को काटना शुरू कर देगा।


इस धमकी को सुनकर मुखिया का खून खौल जाता है और वो कुल्हाड़ी पकड़कर जगीरा के सामने पहुंच जाता है। वह बड़ी हिम्मत दिखाकर जगीरा और उसके साथियों को ललकार लगाता है कि यदि उन्होंने अपनी मां का दूध पिया है तो एक-एक करके मुझसे भिड़ो। यह ललकार सुनकर जगीरा मुखिया की तारीफ करता है "जे बात, इस पूरे गांव में एक ही तो मरद मिला है जो जगीरा से भिड़ने की हिम्मत रखता है। अब लड़ने में मजा आएगा।" इतना कहकर वो अपनी बंदूक छोड़कर घोड़े से उतर जाता है और खंजर निकालकर मुखिया से भिड़ जाता है।


अचानक जगीरा मुखिया से कहता है कि तूने तो अकेले लड़ने की बात कही थी फिर अपने बिटवा को साथ क्यों लाया? जैसे ही मुखिया अपने बेटे को देखने पीछे घूमता है, वहां उसका बेटा नहीं होता। इतनी देर में जगीरा खंजर से गर्दन पर वार करके मुखिया का काम तमाम कर देता है। मुखिया को मारने के बाद जगीरा एक जबरदस्त डायलॉग बोलता है।


"उलटखोपड़िये हमसे भिड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे लेकिन हमारे जैसा कमीनापन कहाँ से लाओगे? मेरे मन को भाया, मैं कुत्ता काट के खाया। लोमड़ी का दूध पीकर पला है ये जगीरा, हमसे ना भिड़ियो।"


जब भी मैं रील लाइफ के इस जगीरा और उसके गिरोह को देखता हूं तो स्वतः ही मेरा ध्यान रियल लाइफ के जगीरा पप्पू  और उसके गिरोह इंडी गठबंधन की तरफ चला जाता है। यह व्यक्ति जगीरा से भी अव्वल दर्जे का कमीना है। जगीरा ने तो केवल बचपन मे ही लोमड़ी का दूध पिया था लेकिन इन मक्कारों के मुंह मे सुबह से शाम तक बस लोमड़ी के ही थन मौजूद होते हैं। आला दर्जे का मक्कार है ये।

बीच बीच में कुछ न कुछ टूलकिट ये लाता ही रहता है जब इसने सारे पैंतरे फेल हो गए तब इसे अहसास हुआ कि जब तक हिनू संगठित रहेगा तब तक सत्ता पाना असंभव है

इसलिए इसने हिनुओं को जातपात में बांटने का तोड़ निकाला है डिवाइड एंड रूल करो का ऐजेंडा चला रहा है

पहले जातिगत जनगणना की बात की अब ये नीइचता की पराकाष्ठा पर पहुंचते हुए हर स्तर पर जात पात की बात करनी शुरू कर दी है

ताजा मामला मिस इंडिया विजेताओं की जातियों का है 


भाजपा चाहे कुछ भी कर ले, अगर नैतिकता के प्रश्नों में उलझी रहेगी तो पप्पू और उसके गिरोह का कुछ भी नहीं उखाड़ पायेगी। और इसे खत्म करने के लिए इससे भी अव्वल दर्जे का कमीनापन और मक्कारी जरूरी है। वरना वो दिन दूर नहीं जब यही पप्पू मीडिया की खब्रांडियों के बलबूते भाजपा और देश का सबसे बड़ा सिरदर्द बनने वाला है। इन चार पांच सालों में यदि इसका बोरिया बिस्तर गोल ना हुआ तो फिर ये नहीं रुकेगा,इतना तय मानकर चलो।

Friday, 23 August 2024

 After four decades of relentless dedication to journalism, guided by a deep commitment to the larger cause of society, I have made the difficult decision to cease writing editorial pieces. The ideals of truth and justice I once upheld seem increasingly irrelevant in a society fractured along narrow caste and religious lines, where the masses are ever-willing to be swayed in any direction by those who exploit division for power. 


Politicians have perfected the art of drawing strength from vote bank politics and divisive agendas, leaving society fractured and vulnerable. Matters are further entrenched by a reservation and quota regime woven into our Constitution with no end in sight—a system that perpetuates division rather than unity. Corruption has metastasized like a cancer, with politicians presiding over a pyramid of pliable bureaucrats whose spines have turned to rubber, bending in any direction to serve their political masters. The entire government machinery and system is driven by the pursuit of money, perks, and comfortable sinecures as a large body of officers have long abandoned any sense of public duty or accountability.


It is with a heavy heart that I withdraw my voice from a discourse increasingly dominated by these corrosive forces. My conscience no longer allows me to engage in a conversation that has become a mere echo chamber of vested interests. The ideals that once inspired this journey have been drowned in the cacophony of short-sighted politics and societal decay.