Saturday, 10 June 2017

मेरे यश को भंजाने की इत्ती जल्दी !
जब मैं सुखी जमीन जोत  रहा था -
कड़ी धुप में जला जा रहा था
बदन श्याह और सूखा जा रहा था
या फिर
जब आंधी तूफान में भींगा जा रहा था
गला जा रहा था, या डूबा जा रहा था
शायद तुमने देखा भी था
मेरी लहू लुहान हथेलियाँ ,
बिवाई फ़टी एड़ी
बुखार से तपता  मेरा शरीर
रात रात   जगती आँखे
बन्द सी हो चुकी रक्त शिराएं
पर उस वक्त तुम न आये ,
देखा तो था तुमने पर तुम्हें दिखा ही नहीं
सुन कर  भी तुमने सुना नहीं
मेरी भूख तुम्हें महसूस क्यों होती ?
मेरी प्यास  अपनी थी न !
मेरा दर्द मेरा , मेरी पीड़ा मेरी !
शायद तुमने मुझे यही था न
की भूख , प्यास ,दर्द आपका , आप भोगें।
आज तुम यहाँ  कैसे?
अच्छा सुनहरी अनाज की बालियाँ  तुम्हें दिखने लगी !
मेरा यश तुम्हे दिखने लगा !
मेरी जयकार तुम्हें  दिखने लगी !
अच्छा ???
Faces without masks are often condemned.
Masked ones earn name ,fame and glory .
I am glad to see the newest learning masking so early.
I could not.

मुझे आप अपने सिचुएशनल फ्रेम में बेशक देखिए ।
मैं अपने मूल गुण-धर्म में शांति से रमण करते रहता हूँ ।
मुझे न वर्तमान से शिकायत , न बीते समय से , न आने वाले कल से ।
मै एक निरंतर यात्रा पर हूँ । रुक जाने या रोक दिये जाने के पहले तक के लिये , बड़ मजे में इतमिनान से ।
तुम आये , अच्छा लगा ,
कम से कम वह कमरा जगा तो सही
वह बेड आज भर अकेला न रहा
डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे तुम - सोह रहे थे
शायद खाना तीखा था , तुम सी सी किए जा रहे थे
बस मुझे आखिरी एक और रोटी देकर मजा आ गया।
पर , अखर गया सुबह का तुम्हारा यूँ उठ जाना
आठ बजे तक टाँग फैला निश्चिन्त न सो पाना
मैं कितने अरमान से झाँक रहा था कि तुम्हें उठाऊंगा
बस अच्छा नहीं लगा कि अहले सुबह आँख तुम्हारी खुली थी
काश ! तुम झूठमूठ ही सही आँख बंद किये पड़े ही रहते
मेरे उठाने पर भी न उठते
कहते ,अभी और सोने न दो
आज बड़े चैन की नींद बहुत दिनों के बाद यहाँ आई है
तुम आये , अच्छा लगा ,
कम से कम वह कमरा जगा तो सही
वह बेड आज भर अकेला  न रहा
डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे तुम - सोह रहे थे
शायद  खाना तीखा था , तुम सी सी किए जा रहे थे
बस मुझे आखिरी एक और रोटी देकर मजा आ गया।
पर , अखर गया सुबह का तुम्हारा यूँ उठ जाना
आठ बजे तक  टाँग फैला निश्चिन्त न सो पाना
मैं कितने अरमान से झाँक  रहा था कि तुम्हें उठाऊंगा
बस अच्छा नहीं लगा कि अहले सुबह आँख तुम्हारी खुली थी
काश ! तुम झूठमूठ ही सही आँख बंद किये पड़े ही रहते
मेरे उठाने पर भी न उठते
कहते ,अभी और सोने न दो
आज बड़े चैन  की नींद बहुत दिनों के बाद यहाँ आई है 

Sunday, 4 June 2017

हर मुसीबत में बुजुर्गो के साथ कानून
Wed, 28 Sep 2016 02:02 AM (IST)
पटना। बागबानों की स्थिति तब बहुत दयनीय हो जाती है, जब वो अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानते हैं। इस अवस्था में वे कई बार किसी की सहायता के तलबगार हो जाते हैं। बुजुर्गो के सामने सबसे बड़ी आफत तब हो जाती है, जब उन्हें अपने बच्चों या फिर अपने परिजन ही उनके हक से वंचित करने की कोशिश की जाती है। इन समस्याओं का मुख्य कारण होता है अपने अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं होना।
बुजुर्गो के अधिकारों की जानकारी दे रहे हैं जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमेश रतेरिया
बुजुर्गो को अपने अधिकारों के प्रति अवश्य ही जागरूक होना चाहिए। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वृद्ध लोगों की न सिर्फ दयनीय स्थिति पर सोचने की बल्कि उनके अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक करने की आवश्यकता है। इस विषय पर मुझे न्यायमूर्ति शांति स्वरूप दीवान की याद आ जाती है, जिन्हें अपने ही घर से उनके बच्चों ने बाहर करने का फैसला लिया और इस बात से आहत उन्होंने पंजाब हरियाणा हाइकोर्ट में 2013 में एक याचिका दायर की। मेरा कहने का ये मतलब है कि अगर एक न्याय देने वाले व्यक्ति को जब इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है तो फिर आम आदमी को तो अधिकारों के बारे में जरूर जागरूक होना चाहिए।
1. जो बुजुर्ग समय रहते अपने उत्तराधिकारी अथवा रिश्तेदार को उपहार स्वरूप या फिर उनका हक मानते हुए अपनी संपत्ति उन्हें स्थानांतरित कर देते हैं, परंतु बाद में अपने भरण पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के लिए धन पाने में असफल रहते हैं, वे ट्रिब्यूनल में अपील कर अपनी जायदाद वापस ले सकते हैं और संपत्ति हस्तांतरण रद्द करवा सकते हैं।
2. द मेंटिनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 बुजुर्गो के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करता है। इसमें प्रत्येक बुजुर्ग अपने अनुमंडल में अनुमंडलीय अधिकारी से अपने बच्चे से उपेक्षा या प्रताड़ित किए जाने पर अपनी सुरक्षा की मांग कर सकते हैं। इसमें उन्हें अपने जीवन निर्वाह के लिए भत्ता उनके बच्चों की आर्थिक स्थिति और माता-पिता की आवश्यकताओं के अनुरूप आनुपातिक रूप से मिलेगा।
3. उच्चतम न्यायालय की घोषणा के अनुसार वैसे मुकदमों की सुनवाई, जिसमें सीनियर सिटीजन पक्षकार हों, उनकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर जल्द किया जाएगा।
4. उच्चतम न्यायालय ने कई बार उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया है कि समस्त अधीनस्थ न्यायालयों में ऐसे मुकदमों की सूची बनाई जाए जिनमें सीनियर सिटीजन पक्षकार हों, ऐसे मुकदमें शीघ्रातिशीघ्र निस्तार किए जाएंगे।
5. वरिष्ठ नागरिकों को रेलवे के किराए में चालीस प्रतिशत छूट दी जाती है। महिला वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह छूट 50 प्रतिशत है। रेलवे के अनुसार वरिष्ठ महिला नागरिक वह हैं जो 58 वर्ष हो चुकी हैं।
6. साठ से अधिक उम्र के प्रत्येक नागरिक को वरिष्ठ नागरिक का दर्जा प्राप्त है और वे उनके लिए निर्धारित सरकारी सुविधाओं के हकदार हैं।
6. आयकर विभाग के नियम में भी बदलाव कर अब वरिष्ठ नागरिकों की आयु सीमा साठ साल कर दी गई है। अत: सभी वरिष्ठ नागरिक आयकर लाभ छूट ले सकते हैं। वर्तमान में वरिष्ठ नागरिकों को अपनी तीन लाख तक की वार्षिक आय पर कोई आयकर देय नहीं है। अति वरिष्ठ नागरिक जिनकी उम्र 80 वर्ष हो चुकी है, उनकी पांच लाख तक की वार्षिक आय पर कोई आयकर देय नहीं है।

Saturday, 3 June 2017

कल शाम को ही बनबन्धु परिषद , पटना चैप्टर की ऑफिस में श्रद्धेय विनोद कनोडिया जी ने  बड़े ही प्रेम से उनके अपने परम् मित्र और कलकत्ते के लब्ध प्रतिष्ठ उद्योगपति साहित्यानुरागी श्री बींजराज रांका द्वारा संकलित , लिखित तथा सम्पादित बृहद पुस्तक - " माँ मेरी माँ " भेंट की।
सुखद आश्चर्य हुआ। उनका स्नेह पा , और वह  भी पुस्तक रूप में , मन गदगद हो गया।
आकर्षक सज्जा , बाइंडिंग , प्रस्तुति।
पुस्तक सहज आकर्षित करती है।
मातृस्वरूपा स्व०   सरला बिड़ला जी को याद करते हुए श्री रांका जी ने अपने माता-पिता को समर्पित की है।  अच्छा लगा।
संस्कारों के परिष्करण के पावन उद्देश्य से रचित -उपक्रमित ; साधुवाद।
माँ - एक भाव , भावना , स्पंदन , स्पर्श , सुरक्षा , निर्देश , शिक्षा , संस्कार ,केवल प्रेम !
श्यामा जी की उच्च स्तरीय कहानियों सा सज्जित।  ममता कालीया जी , मन्नू भंडारी जी की कहानियों का संग्रह- संकलन , डा o कुसुम खेमानी , जी की कहानी , त्रिपाठी जी की कहानी से कहानी संग्रह भाग सार्थक बन पड़ा. है। एक ही धारणा की ममत्व भरी २० कहानियों के सार्थक संग्रह के लिए संकलनकर्ता के परिश्रम मनोयोग की सम्पूर्णता प्रमाणित होती है।
लगभग ८० कविताओं का विषय केंद्रित संकलन - चुन चुन क्र उच्चतम साहित्यिक मूल्य की कविताएँ संकलित की गयी है।
पुस्तक के पृष्ठ २१३ में संकलन कर्ता की अपनी लविता माँ में कवि घोषणा क्र ही डालता है - माँ शब्द नहीं आत्मा ही है परमात्मा 
सुधा बालकृष्णन जी का मातृत्व की भावना  पर गवेषणात्मक लेख विद्व्तापूर्ण साहित्यिक लेख हे , फिर भी ह्रदय और मन को एक साथ स्पर्श करता है।
वंदना मिश्र जी ने सही ही अनुभव किया - माँ ने कभी उफ़ नहीं किया।
माँ चेतना का श्रोत है। हौसला है।  प्रेरणा है , हिम्मत है।
संकलन कर्ता ने माँ  के संदर्भ में साहित्य का संकलन करते समय उर्दू साहित्य की भी यात्रा की यह डा ० शाहिना तबस्सुम की प्रस्तुति पृष्ठ २३५ में उर्दू साहित्य में  माँ  ,  डा o मनाज़िर आशिक़ हरगानवी ,पृष्ठ २८५  ,शायरी में माँ ; से स्पष्ट है।
माँ के संदर्भ में संकलित गद्य संग्रह  में. आध्यात्मिक जगत के श्रेष्ठ जनों के आलेख संकलन को पूर्णता देते प्रतीत होते हैं।  माँ शारदा का उल्लेख -चित्रण - विवरण -विश्लेषण एक झंकार उतपन्न करता है।
माँ का शक्ति रूप विवेचन संग्रह को और ऊंचाई पर ले जाने में सक्षम है माँ का देवी रूप निरूपण हमारी आर्ष संस्कृति के अनुरूप ही गहराई लिए हुए है।
एक बानगी पुस्तक पृष्ठ २८५ से - माँ एक सीप है जो संतान के लिए  लाखों भेद आप[ने सीने में छुपा लेती है।
किताब का पृष्ठ २८ ५ ता पृष्ठ ३०० काफी प्रभावी भाग है जिसमे अनेक लेखक -कवि -मनीषी -विचारकों के माँ के प्रति भाव एक ही स्थान पर देखने को मिल जाते है।
वेदोक्त माँ का स्वरूप विवेचन अच्छा -उपयोगी लगा।  माँ को उसकी पूर्णता में महसूस करना तो असम्भव है पर इस दिशा में मेरे जैसे अभ्यासी के लिए यह पुस्तक एक सम्ब्ल प्रतीत होती है।
संकलन कर्ता ने बांग्ला , असमिया , अंग्रेजी , संस्कृत, कन्नड़ ,तेलगु ,तमिल , पंजाबी , मराठी - विदेशी भाषाओं तक में माता के भाव को खोज डाला है।
पृष्ठ ४९६ में प्रकृति स्वयं माँ है शीर्षक बींजराज जी की भावना विचारणीय है।
घर घर में गरिमा के साथ धारण करने लायक पुस्तक के लिए पुस्तक प्रणेता श्री रांका जी को बहुत बहुत साधुवाद.