Saturday, 3 January 2015

सार्वजनिक निन्दा से बचने का सत्प्रयास तो कर ही सकता हूँ .बस इसके लिये अपने ही स्वार्थ को त्यागना पड़ेगा.
अपने ही मन की ही करूंगा ,केवल अपने ही हित का ही करूंगा - मुझे तुमसे और तुम्हारे से विरोध भी करना पड़े तो भी मैं जो मन में आया जो जब पसंद आया वह ही करूंगा ---यह आचरण सार्वजनिक निन्दा की पात्रता पैदा करता है .
स्वेच्छाचारी होने से बचे. यह आरोप निन्दा का समुचित कारण है 


मैनें तुम सब को भटकने के लिये न तो छोड़ा , न उकसाया न भटकने दिया . मैंने सदैव ब्रेक टाईट ,तथा स्टेयरिंग पर कठोर नियन्त्रण की ही बात करी , अपनी सुरक्षित यात्रा की सारी तयारी तुम्हें स्वयं करनी होगी . मेरा काम तुम्हें अब तक सुरक्षा देना था , साधन देना था .
सम्भल कर अब आगे चलो . मैं तुम्हारे साथ हूँ .बस अब जिम्मेवारी तुम अपनी रखना . और हाँ ,अब तुम्हें तुम्हारी गलती कोई नहीं बतायेगा . लोग इंतजार करेंगें कि कब तुम गलती करो . अब तुमने ग्ल्तिक्रने का अधिकार खो दिया है .क्षमा याचना का भी तुम्हारा अधिकार खत्म . अब तुम्हें तुम्हारी गलतियों की सजा मिलेगी . बस इतना भर ख सकोगे की यह अनुपात से अधिक है . क्षमा नहीं दंड ही अब तुम्हारी नियति .
और हाँ , सुरक्षित आगे की उपर की यात्रा पर यश अर्जित करने का अवसर -अधिकार तुम्हारा.
मैं तो प्रसन्न ही होना चाहूँगा .
Let us choose a precedent as per our choice-----
Lawyers paradise --- poor litigants gamble ---- let us take a chance -- who knows how the same court or same judge decides this time ------ courts stand for uncertainty --- only chance wins --- let us try our luck through a lawyer
विवेक मत गतिशील होता है क्यों की विवेक समय सापेक्ष होता है और समय सदा गतिशील होता है . विवेक जड़ हो ही नही सकता . विवेक नित्य-नवीन होता है 
न कुछ सही होता है न गलत -- सभी कुछ समय-परिस्थिति-व्यक्ति -स्थान सापेक्ष भर ही होता है -- सब कुछ एक फ्रेम में अर्थ भिन्न होते हैं

Friday, 2 January 2015

सत्य केवल अभिप्रेत लक्ष्य
Ensure dignity to District Judiciary. At least change the name . Constitution names it Subordinate Judiciary- A sheer insult undermining the District Judiciary. Raise your voice to restore the confidence of ground level judiciary. You cannot call BACKBONE and SUBORDINATE simultaneously.