Thursday, 29 August 2019
Tuesday, 27 August 2019
Wednesday, 21 August 2019
Monday, 19 August 2019
विचार विलास और प्रपंच से मुक्ति
क्या करूँ ?
एक तरफ बुद्धि, दूसरी ओर विवेक और चारों ओर से घेरे सामाजिकता, ब्यवहारिकता।
एक तरफ अनूभव और दूसरी ओर स्वयं को आपदमस्तक आमूल-चूल आपके सामने खोल डालने का संकल्प।
आप सोच, समझ सकते है ; स्वयम को निरावृत करना कैसा कठिन रहा होगा ?
कभी कभी सोचता हूँ कि दिगम्बर जैन मुनियों की दीक्षा के क्षण की अनुभूति कैसी होती होगी ?
आज यह सब लिखते हुए सोचता हूँ कि कृष्ण अर्जुन के सामने कैसे दिब्य हुए होंगे ?
ब्यक्ति जब निरावृत होता है तब दिब्य होता है।
ईश्वर जीव को निर्मल निरावृत ही भेजता है और मुक्त निरावृत ही प्राप्त करता है।
ईश्वर से मुक्त होते ही जीव पर उसका कर्मफल आ विराजता है, अपना आवरण डाल अपने आगोश में ले लेता है।
ईश्वर प्रदत्त इस दिब्य देह से उन कर्म फलों का निराकरण किया जा सकता है।
पर जन्म के बाद से ही हम और आप प्रति क्षण नये कर्म फल आवरण से अपने आप को आवेष्ठित करते रहते हैं। हमें अपने आवरणों से प्रेम होता है, ममता होती है। यह निरन्तर बढ़ते ही जाता है।इतना ही जाता है कि उन आवरणों में कोई छूट जाये तो बेचैनी होती है।
वस्तुतः आवरण हमारी बौद्धिकता या तर्क शक्ति के कारण उत्पन्न होता है।
यह जो कुछ मैं लिख रहा हूँ, आप पढ़ रहे है, वह भी एक आवरण ही है।
चिंतन, मनन,,अध्ययन, अध्यापन, विचार या विचार प्रक्रिया, ये सब वस्तुतः आवरण आवेष्टन की प्रक्रिया ही है।
जैसे एक कीड़ा अपने ही मुँह से निकाली लार से अपने ही चारों ओर एक जाल बुनते चला जाता है, कोकून बन जाता है उसी प्रकार मैं भी अपने ही विचार विलास से आवृत्त होते जाता हूँ।
उस विचार विलास से मुक्ति सहज नहीं।
मेरे लिये भी नहीं।
शरणागत हो मुक्ति की प्रार्थना है।
ॐ, शान्ति, शान्ति !!
एक तरफ बुद्धि, दूसरी ओर विवेक और चारों ओर से घेरे सामाजिकता, ब्यवहारिकता।
एक तरफ अनूभव और दूसरी ओर स्वयं को आपदमस्तक आमूल-चूल आपके सामने खोल डालने का संकल्प।
आप सोच, समझ सकते है ; स्वयम को निरावृत करना कैसा कठिन रहा होगा ?
कभी कभी सोचता हूँ कि दिगम्बर जैन मुनियों की दीक्षा के क्षण की अनुभूति कैसी होती होगी ?
आज यह सब लिखते हुए सोचता हूँ कि कृष्ण अर्जुन के सामने कैसे दिब्य हुए होंगे ?
ब्यक्ति जब निरावृत होता है तब दिब्य होता है।
ईश्वर जीव को निर्मल निरावृत ही भेजता है और मुक्त निरावृत ही प्राप्त करता है।
ईश्वर से मुक्त होते ही जीव पर उसका कर्मफल आ विराजता है, अपना आवरण डाल अपने आगोश में ले लेता है।
ईश्वर प्रदत्त इस दिब्य देह से उन कर्म फलों का निराकरण किया जा सकता है।
पर जन्म के बाद से ही हम और आप प्रति क्षण नये कर्म फल आवरण से अपने आप को आवेष्ठित करते रहते हैं। हमें अपने आवरणों से प्रेम होता है, ममता होती है। यह निरन्तर बढ़ते ही जाता है।इतना ही जाता है कि उन आवरणों में कोई छूट जाये तो बेचैनी होती है।
वस्तुतः आवरण हमारी बौद्धिकता या तर्क शक्ति के कारण उत्पन्न होता है।
यह जो कुछ मैं लिख रहा हूँ, आप पढ़ रहे है, वह भी एक आवरण ही है।
चिंतन, मनन,,अध्ययन, अध्यापन, विचार या विचार प्रक्रिया, ये सब वस्तुतः आवरण आवेष्टन की प्रक्रिया ही है।
जैसे एक कीड़ा अपने ही मुँह से निकाली लार से अपने ही चारों ओर एक जाल बुनते चला जाता है, कोकून बन जाता है उसी प्रकार मैं भी अपने ही विचार विलास से आवृत्त होते जाता हूँ।
उस विचार विलास से मुक्ति सहज नहीं।
मेरे लिये भी नहीं।
शरणागत हो मुक्ति की प्रार्थना है।
ॐ, शान्ति, शान्ति !!
खुल जाने के बाद
याद है न । श्री कृष्ण ने स्वयं को सार्वजनिक कर दिया था। कृष्ण खुल गये।
खुल जाने के बाद उनका विराट रूप अब उनका अपना नहीं रहा, सार्वजनिक हो गया।
वह रूप अब न उनका अपना, न अपने लिये, न ही अर्जुन के लिए अकेले का अनुभव रहा।
उसे संजय ने देखा। अंधे धृष्टराष्ट्र ने भी देखा था।उसके बाद अनन्त पीढ़ियों ने देखा।
स्वयं को सार्वजनिक कर देने के बाद फिर उसे ब्यक्तिगत नहीं बनाया जा सकता। वह सार्वजनिक हो सार्वजनिक ही रह जाता है।
पर दिक्कत यह है कि सार्वजनिक किये जाने लायक कुछ रहता ही नहीं, होता ही नहीं।
मेरी समझ में मनुष्य का जीवन तो संकीर्णताओं, क्षुद्रताओं, स्वार्थो, आवेगों, संवेगों, भावनाओं के क्षणिक संघर्ष का क्रम बन्धन भर है।
लगभग छिपाने, दिखाने, बताने योग्य कुछ भी है ही नहीं।
ऐसी स्थिति में स्वयं को सार्वजनिक करते समय एक दोष भाव आता जा रहा है।
केवल यही कहूँगा की जितनी भी लघुता होगी, जितनी भी लघुताएँ सम्भव है, वे सारी मुझमें होंगी।
यदि लघुता के विपरीत कुछ भी है, होगा तो वह उनका या आप लोगों का दिया ही होगा। पूर्वजों के संस्कार होंगे या ईश्वरीय कृपा। यह भी हो सकता है कि ईश्वरीय कृपा, प्रकाश का परावर्तन हो।
वैसे हजार बार भी ये मान लेने पर भी कि मैं पाप पुंज हूँ, मेरा हृदय यह मानने के लिये तैयार ही नहीं कि मैं उस परम सत्ता की कृपा से विमुख रहूँगा।
जब गिद्ध विमुख नहीं रहे, वानर सन्मुख-साथ हुए, वृक्ष, मधुकर श्रेणी, मृग सब साथ थे, समुद्र, पहाड़ सब साथ आ गये, वनस्पति और किट भृग साथ आये तो मैं क्यों निराश होऊं।
मैं स्वयं को उन्हीं के सहारे छोड़ सबके सामने अपने पापों की पोटली खोलूँगा, स्वयं को पूर्णतः सार्वजनिक करूँगा। शायद पोटली सार्वजनिक करते करते, खोलते खोलते उस प्रभु की कृपा मैं पुनः देख पाऊँ। नहीं भी देख पाऊँ तो शायद समझ पाऊँ।
यदि मैं न देख पाऊँ, न समझ पाऊँ तो शायद आप में से कोई उसे खोज, देख, समझ ले।
पर यह प्रयास मेरा। यह यात्रा मेरी। मेरे सारे अपराध मेरे।
आप में से कोई भी किसी प्रकार मेरे अपराध भाव को प्राप्त न करे।
यही प्रभु से प्रार्थना है।
ॐ शांति !
खुल जाने के बाद उनका विराट रूप अब उनका अपना नहीं रहा, सार्वजनिक हो गया।
वह रूप अब न उनका अपना, न अपने लिये, न ही अर्जुन के लिए अकेले का अनुभव रहा।
उसे संजय ने देखा। अंधे धृष्टराष्ट्र ने भी देखा था।उसके बाद अनन्त पीढ़ियों ने देखा।
स्वयं को सार्वजनिक कर देने के बाद फिर उसे ब्यक्तिगत नहीं बनाया जा सकता। वह सार्वजनिक हो सार्वजनिक ही रह जाता है।
पर दिक्कत यह है कि सार्वजनिक किये जाने लायक कुछ रहता ही नहीं, होता ही नहीं।
मेरी समझ में मनुष्य का जीवन तो संकीर्णताओं, क्षुद्रताओं, स्वार्थो, आवेगों, संवेगों, भावनाओं के क्षणिक संघर्ष का क्रम बन्धन भर है।
लगभग छिपाने, दिखाने, बताने योग्य कुछ भी है ही नहीं।
ऐसी स्थिति में स्वयं को सार्वजनिक करते समय एक दोष भाव आता जा रहा है।
केवल यही कहूँगा की जितनी भी लघुता होगी, जितनी भी लघुताएँ सम्भव है, वे सारी मुझमें होंगी।
यदि लघुता के विपरीत कुछ भी है, होगा तो वह उनका या आप लोगों का दिया ही होगा। पूर्वजों के संस्कार होंगे या ईश्वरीय कृपा। यह भी हो सकता है कि ईश्वरीय कृपा, प्रकाश का परावर्तन हो।
वैसे हजार बार भी ये मान लेने पर भी कि मैं पाप पुंज हूँ, मेरा हृदय यह मानने के लिये तैयार ही नहीं कि मैं उस परम सत्ता की कृपा से विमुख रहूँगा।
जब गिद्ध विमुख नहीं रहे, वानर सन्मुख-साथ हुए, वृक्ष, मधुकर श्रेणी, मृग सब साथ थे, समुद्र, पहाड़ सब साथ आ गये, वनस्पति और किट भृग साथ आये तो मैं क्यों निराश होऊं।
मैं स्वयं को उन्हीं के सहारे छोड़ सबके सामने अपने पापों की पोटली खोलूँगा, स्वयं को पूर्णतः सार्वजनिक करूँगा। शायद पोटली सार्वजनिक करते करते, खोलते खोलते उस प्रभु की कृपा मैं पुनः देख पाऊँ। नहीं भी देख पाऊँ तो शायद समझ पाऊँ।
यदि मैं न देख पाऊँ, न समझ पाऊँ तो शायद आप में से कोई उसे खोज, देख, समझ ले।
पर यह प्रयास मेरा। यह यात्रा मेरी। मेरे सारे अपराध मेरे।
आप में से कोई भी किसी प्रकार मेरे अपराध भाव को प्राप्त न करे।
यही प्रभु से प्रार्थना है।
ॐ शांति !
गणित तो हर जीव का नैसर्गिक दर्शन है।
जब एक बाज-गिद्ध उड़ते हुए, मछलियां तैरते हुए, चीता शिकार के लिये दौड़ते हुए अपनी बॉडी को सेट करता है, स्पीड रेगुलेट करता है और अपनी दौड़, उड़ान के कोण को शिकार के साथ एडजस्ट करता है वह आज की मिसाइल टेक्नोलॉजी से वही प्रखर है, सटीक है, अध्ययन योग्य है ।
जिस तरह एक अनपढ़ रिक्से वाला भिन्न दूरी के सवारी ले जाने के या वजन ले जाने के प्रस्ताव के बाद भार, दूरी, समय, रास्ते के उतार चढ़ाव आदि का मैट्रिक्स बना एक उत्तर तत्काल दे डालता है, वह मेथेमेटिकल दर्शन ही तय है।
एक नवजात का आवाज सुन आवाज के स्रोत के कोण की ओर गर्दन घुमाना, किसी रंगीन वस्तु की ओर आंख घुमा कोण सेट करना, क्रमशः औपचारिक गणित ज्ञान के बिना छोटे बड़े आकार का ज्ञान सब कुछ गणितीय दर्शन ही तो है।
गणितीय संख्याएं वास्तव में उसी मानवीय गणितीय दर्शन को अभिब्यक्त करने की भाषा भर ही तो है।
जब एक बाज-गिद्ध उड़ते हुए, मछलियां तैरते हुए, चीता शिकार के लिये दौड़ते हुए अपनी बॉडी को सेट करता है, स्पीड रेगुलेट करता है और अपनी दौड़, उड़ान के कोण को शिकार के साथ एडजस्ट करता है वह आज की मिसाइल टेक्नोलॉजी से वही प्रखर है, सटीक है, अध्ययन योग्य है ।
जिस तरह एक अनपढ़ रिक्से वाला भिन्न दूरी के सवारी ले जाने के या वजन ले जाने के प्रस्ताव के बाद भार, दूरी, समय, रास्ते के उतार चढ़ाव आदि का मैट्रिक्स बना एक उत्तर तत्काल दे डालता है, वह मेथेमेटिकल दर्शन ही तय है।
एक नवजात का आवाज सुन आवाज के स्रोत के कोण की ओर गर्दन घुमाना, किसी रंगीन वस्तु की ओर आंख घुमा कोण सेट करना, क्रमशः औपचारिक गणित ज्ञान के बिना छोटे बड़े आकार का ज्ञान सब कुछ गणितीय दर्शन ही तो है।
गणितीय संख्याएं वास्तव में उसी मानवीय गणितीय दर्शन को अभिब्यक्त करने की भाषा भर ही तो है।
शांति का मार्ग
हल्के होने और खुलते रहने का मार्ग ही शान्ति तक ले आया। जितना छिपाया, जितना छीपा, उतना ही अशांत हुआ।
खुलने में जितनी देरी की, शांति को ले कर संशय बना रहा।
एक झटके में जो खुला, सब कुछ सब के सामने खोल कर रख दिया, जैसे ही कुछ भी छिपा न रहा, सब कुछ बदल गया।
सब कुछ वही था।
मेरी नजर बदली और सब कुछ बदला।
बदली तो उनकी भी नजर।
पहले तो किसी ने विश्वास ही नहीं किया कि यह वास्तव में खुल ही गया, सब कुछ आम कर ही गया।
उनके मन में प्रश्न था कि यह कैसे हो सकता है कि अब इसके पास कुछ भी छिपाने लायक भी नहीं रहा !
पहले उन्हें झटका लगा।
अब तो उनकी भी निगाह बदल गयी।
नजर बदली, निगाह बदली, अर्थ और समझ, सब बदल गए।
सारा संशय साफ।
बस परमात्मा यही शक्ति देना, इसी तरह सदा खुला रहूँ, कुछ भी किसी से भी छिपा न रहे।
मैं कभी किसी को न बोलूं :-
धरमदास तोहे लाख दुहाई, सार वस्तु बाहर न जाई।
परमात्म और आत्म परिचय को सार्वजनिक हो जाने दो।
ॐ शांति
खुलने में जितनी देरी की, शांति को ले कर संशय बना रहा।
एक झटके में जो खुला, सब कुछ सब के सामने खोल कर रख दिया, जैसे ही कुछ भी छिपा न रहा, सब कुछ बदल गया।
सब कुछ वही था।
मेरी नजर बदली और सब कुछ बदला।
बदली तो उनकी भी नजर।
पहले तो किसी ने विश्वास ही नहीं किया कि यह वास्तव में खुल ही गया, सब कुछ आम कर ही गया।
उनके मन में प्रश्न था कि यह कैसे हो सकता है कि अब इसके पास कुछ भी छिपाने लायक भी नहीं रहा !
पहले उन्हें झटका लगा।
अब तो उनकी भी निगाह बदल गयी।
नजर बदली, निगाह बदली, अर्थ और समझ, सब बदल गए।
सारा संशय साफ।
बस परमात्मा यही शक्ति देना, इसी तरह सदा खुला रहूँ, कुछ भी किसी से भी छिपा न रहे।
मैं कभी किसी को न बोलूं :-
धरमदास तोहे लाख दुहाई, सार वस्तु बाहर न जाई।
परमात्म और आत्म परिचय को सार्वजनिक हो जाने दो।
ॐ शांति
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