Monday, 28 December 2020

 1982 के आस पास की बात है। मैं वकालत के पेशे में प्रवेश का इच्छुक था। जिला मुख्यालय में कस्बे की कचहरी ही उपलबद्ध विकल्प थी। सीनियर खोज रहा था। एक यदुवंशी ५५ एक साल के पी पी थे। देहाती वेशभूषा। राजनैतिक चरित्र। समाजवादी टाईप। अक्खड़। मुंहफट। पर कचहरी में व्यापक स्वीकार्यता थी। प्रांत के नेता, मंत्री आते रहते थे। डी एम, एस पी भी आते रहते, उनको बुलाते रहते। बार, बेंच में भी दब दबा।

उन्होंने बताया कि सरकारी लोग सक्षम लोगों से अपना काम निकलवाने, समुचित सलाह के लिए आपकी बड़ाई करते है। आपको फुलाते है। फूलना मत।

और सरकारी लोगों के आने जाने की धमक से आम आदमी आपसे दूर हो जाएगा , डर जायेगा, आपको भी हाकिम ही समझने लगेगा, अपनी बात डर के मारे कह ही नहीं सकेगा। उन्होंने बताया कि गांव देहात का आदमी साहबी ठाठ से घबराता है कि साहब है न जाने कौन सी बात का बुरा मान कहां फॅसा दे। बहुत डरता है।

उन्होंने साहबी रंगबाजी से दूर रहने को कहा। आम लोगों से तब भी संवाद करते रहने की सलाह दी जब ऐसा करना सम्भव न हो। उन्होंने संवाद के लिए किसी बिचौलिए को बीच में न लाने की बात समझाई।

 लम्बित मुकदमें लाखों की रोजी रोटी का आधार है। कोई भी मुकदमों के निस्तार होने मे ईमानदारी से रुचि नहीं रखता। यहाँ समय समय पर मुकदमों का प्रमोशन होता है। मुकदमे अमीबा की तरह खुद ही अपने न्युक्लीयस का विखंडन कर नये मुकदमे पैदा करते है। अपील, रिवीजन, रिव्यू, इंटरलोकट्री मैटर ये एक ही मुकदमें के बाल बच्चे होते है और स्वतंत्र मुकदमों की शक्ल अख्तियार कर लेते है।

मुकदमे वकील, मुहर्रिर की दुधारू गाय है। मुकदमेबाज का खेल है। कुछ का प्रिय हथियार है। हारे हूए की झूठी उम्मीद है। सरकार के लिये दायित्व और खिलवाड़ है। मुकदमें रक्त बीज है। मुकदमें एक सन्त्रास है।बड़े धनी लोगों का विलास है।मुकदमे एक भार है, दायित्व है जो पीढियों की यात्रा करता है।

मुकदमे कचहरी की तमाम शक्तियो की रखैल है। ये परस्पर संयोग कर इन्हीं शक्तियों के कमाऊ पूत पैदा करते है।

कोई नहीं चाह्ता इनका निस्तार।

न्यायालय का आधार है। न्यायालय के डेटा है। फाईल है।

 अंग्रेजों के द्वारा खड़ा किया गया कचहरी का ढाँचा नेटिव लोगों के दमन की संस्था थी और इससे जुड़े लोग अंग्रेजों की ब्यवस्था के दलाल ?

Thursday, 5 November 2020

 बीजेपी वाले चीन को बाप नहीं समझते। मक्का मदीना, पकिस्तान की रखैल नहीं है। ये अमेरिका, पकिस्तान ही नहीं मालदीव के भी दोस्त है। बीजेपी वाले पाकिस्तानी एटम बम के विज्ञापन नहीं।बी जे पी वाले क्वात्रोची या एंडरसन भक्त नही माँ भारती के भक्त है। ये खानों और रवीशियों को पद्म दान नहीं देते। ये नेशनल हेराल्ड पचावन हार नहीं है। ये बैकोंक मे नाचे नहीं, न ही 2g, कोयला, कॉमनवेल्थ गटकन हार है। ये सेना को भूखे नंगे, बिना हवाई जहाज के सुलावन हार नही है

ये राम मन्दिर बणावण हार, 370 हटावन हार, अफजल वानी सैफुल्लाह तारण हार है इस लिये इन्हें अन्ध भक्त कहा जाता है। इन्हें गर्व है।

बस इस लिये कमिशन खावन हार इन्हें अन्ध भक्त कहते है।आ

 दोषी लगने, दिखने से लेकर दोषी सिद्ध होने, दोषी प्रमाणित होने तक के बीच की यात्रा के लिये जमानत की ब्यवस्था है। पुलिस दोषी दिखने या लगने तक ही है। दोषी ही है, यही इसी अपराध का विधानत: दोषी है यह न्यायालय का काम है। पुलिस का काम दोषी सिद्ध करना, प्रमाणित करना नहीं है। पुलिस को बन्दूक दी गई है। उसे निर्णय का भी अधिकार दे देंगे क्या?

कोर्ट को निर्णय का ही अधिकार है। बन्दूक कोर्ट के पास नहीं है।

 फिल्मों में इशारों में कही बात को समझते तो हम अपने अनुभव से ही है।

5/10/20 % ही तो दिखाया जाता है, फिल्मों में, बाकी 80/90/95% तो समाज स्वयं कल्पना करता है।

गानों में इशारे ही तो है औऱ समाज पूरा दृश्य देखने लगता है। नाचने लगता है, रोने लगता है, सर्वांग उत्तेजित हो अश्लील हरकतें करता है। 90 % तो फ़िल्म वाले कि यात्रा नहीं रहती।

वह तो एक दिशा में कोई तीर छोड़ता है। संकेत भर करता है। बाकी की तो आपकी अपनी यात्रा है। आपकी संस्कार जनित, नीति जनित, उत्तेजना जनित, आदत से प्रभावित, तर्क से तय की गई, अंदाज तो आपने खुद ही लगाया।

वह तीर किस दिशा में छोड़ा गया इसका अंदाज समाज को ही लगाना है।

अब यदि फ़िल्म वाले ने, गाने वाले ने, डायलॉग लिखने वाले ने, कलाकार ने अपने लिखे, बोले, किये, देह यष्टि से आपको ताड़ लिया या आपने 10% मार्ग दिखाने पर बाकी नब्बे % मार्ग तय कर लिया,अपना रास्ता खोज लिया तो मानना चाहिए कि फ़िल्म वाले ने, लिख कर, बोल कर, देह यष्टि से आपको आपका वास्तविक रूप दिखाया।

तो हुई न फ़िल्म, गीत, डायलॉग आपकी तस्वीर और समाज का आईना।

 क्या जिला न्यायालय में हारा हुआ मुकदमा उच्च न्यायालय में जीता जा सकता है? तब जब साक्ष्यों और गवाहों को जिला न्यायालय ने सिरे से नकार दिया हो।

आपराधिक मामलों में उच्च न्यायालय में निम्न न्यायालय के दोष सिद्धि के 67% कमो बेस मामलों में लाभ मिलता ही है। सिविल मामलों में भी 40 प्रतिशत फर्स्ट अपील में और 20 प्रतिशत सेकंड अपील में राहत मिलती है।

ये प्रतिशत में आंकड़े एक आकलन भर ही है, सत्यापित नहीं है, किसी अध्ययन पर नहीं हैं। अनुभव आधारित ब्यक्तिगत स्वतः स्फूर्त आकलन है, वैज्ञानिक नही, अनुभव आधारित है।

उच्च न्यायालय में अपील अवश्य की जानी चाहिए।

जो जहाँ थक गया वहीं हार गया।

न्यायालयों में निर्णय कुश्ती के खेल की तरह है। दांव पेंच, सामने वाले कि ट्रेनिंग, प्रत्युतपन्नमति, क्रिया-प्रतिक्रिया, क्षमता, सजगता, स्टेमिना, ताकत, निर्णायक तिथि को उपलब्ध साधन, सहयोग, संयोग पर निर्भर करता है।