Monday, 7 January 2019

बॉडी लैंग्वेज सही रखो।
जब भी बैठे, दोनो टांगों को समेट के बैठें।
कभी भी पसर के नहीं बैठें। आदत पड़ जाती है।
गलत को गलत नहीं समझेगा दिमाग, तो सब चलता है --आगे भी चलायेगा।
दिमाग को समझाना पड़ता है-सार्वजनिक स्थानों पर क्या न करो।
गाली देने की आदत आपके अपने घर, स्कूल महल्ले में अनायास ही पड़ जाती है।
असावधान हुए नहीं कि परिवेश से ही यह सब बॉडी लैंग्वेज और सोसल लेंग्वेज की आदत पड़ जाती है।
When did you last threw a signal that you were, are and will be ready to be used that way he /she or they would proposed and would not resist to be used and thrown.
That was your moment to be recruited, chosen, appointed, nominated where subjectivity plays the last final tune...
Mr so and so...
I want illegal acts done through you... Legally
I expect honesty, kindness through you while dealing with all sorts of dishonest and cruel transactions.
Will you do ?
Tell me your terms ?
 Sir, if Lord pleases that way let that be..
No terms, only your grace, my lord..
You are in
मेरी शिक्षा क्लास, कुछ पहले --
बाद में समझ में भी आ जायेगा। अभी कहीं सेव कर लो , किसी फाइल में, बाद मैखुद ब खुद रिकवर हो जायेगी और प्रोग्राम खुद रन्त करने लगेगा।
You can acquire superior legal knowledge and use it at your job, which will ensure you always stay miles ahead of everyone.
 It's hard to put in the hours to gain that level of insight for everyone. Moreover,  for every piece of additional legal insight you acquire and use, you race far ahead and keep it for life with yourself.

  1. It widens your competitive advantage.
कभी, कहीं, आपने ही तो अपने ब्यवहार, संकेत, शब्द, आने जाने का समय, वेशभूषा, खाने पीने की स्थिति-चर्या, सार्वजनिक जीवन के या ज्ञात स्वरूप के चलते उसे नहीं उकसाया ?
सावधान रहना ही उचित है।
बिना उकसावे के नहीं होता , सामान्यतः।

  • लोभी भी इसी तरह उकसावे में आते है।

Monday, 24 December 2018

पर्दे में रहना बड़प्पन नहीं, भय की निशानी है।पवित्रता की नहीं ब्यभिचार की निशानी है। पशु, पक्षी को कभी भी किसी समय किसी आवरण की आवश्यकता नहीं होता। फूल पौधों को भी नहीं। नदी नालों  को भी नहीं।
फिर हमको और आपको क्यों ? हम क्यों अपने चारों ओर दीवार पर दीवार, प्रकोष्ठ डर प्रकोष्ठ बना लेते हैं।
न्यूक्लियर बम ताकत नहीं शुद्ध भय का परिचायक है।
यदि भय नहीं होगा तो आपको किसी आवरण की जरूरत नहीं होगी।
सबसे अधिक भय मनुष्य को अपने आप से लगता है।वह पाप करता है।और पाप का फल जानता है। विवेक और स्वार्थ, कर्तब्य और स्वार्थ, अधिकार और लोभ-स्वार्थ के घालमेल भय का कारण है, भय के कारण है।
इसी से स्ट्रेस है, तनाव है।
केवल स्वार्थ के साथ खड़े हो जाइए, स्ट्रेस से बच जाएँगे।केवल विवेक के साथ  हो कर भी स्ट्रेस से बचा जा सकता हसि। पर स्ट्रेस तब आता है जब हम आप स्वार्थ और विवेक दोनों की साधना चाहते हैं।आग और पानी को एक साथ साधना चाहते है।जमीन और आसमान को एक साथ छूना चाहते हैं। क्षितिज को आसमान और जमीन मिलने का स्थान समझ बैठते हैं। आसमान और क्षितिज वहीं मिलते है। बस उधर ही दौड़ गए।जितना मर्जी दौड़ो, क्षितिज तो दूर ही रहेगा। आसमान और पृथ्वी तो मिलते नहीं। यह तो तुम्हारा दृष्टि दोष है। उसी को आप सत्य, वास्तविकता मान बैठे हो। आसमान छोड़ दो, पृथ्वी पर अपने आप आ जाओगे। धरती छोड़ दो, आसमान पर चले जाओगे।
पर धरती, आसमान, आग, पानी, संसार और शिव सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश ही स्ट्रेस का कारण है।
शुद्ध पवित्र हो जाओ, स्ट्रेस गायब।

  1. शुद्ध अपवित्र हो जाओ, स्ट्रेस गायब।क्यों करते हो पवित्रता की चिंता। यदि अपवित्र हो यो वैसे ही दिखो।अपवित्र रहो और स्वीकार करो। वैसा ही दिखो। देखो, स्ट्रेस गायब।