Saturday, 4 April 2015

काबिल तो आम बनने के नहीं, तूने मुझे खास ही बना डाला .
मेरा तो कोई काम ही नहीं ,तूने मुझे उनकी आस बना डाला .
सीमा तो कुछ की भी नहीं है  - करने की या न करने की ., अच्छे या अच्छाई की या बुरे और बुराई की .
प्रश्न केवल विषय विस्तार का ही है . विस्तार की सीमा नहीं होती .
संस्था के हित में काम करना कठिन है . इस उत्साह को लोगों को समझाना बड़ा मुश्किल है .


Friday, 3 April 2015

मेरी कहानी खत्म नहीं होती -चलती रहती है ,चलती रहेगी , मैं या कि तुम या वे सब - कोई भी  कितना भी चाहेगा तब भी नहीं - कोशिश कर के थक भी जाओगे तब भी नहीं .
हाँ - कहानी में कुछ  तीता -कसैला -बेस्वाद हो सकता है - कुछ रंगों का बेमेल संयोजन भी हो तो आश्चर्य नहीं .मैनें अपने जीवन की कहानी के प्लाट की तरह पहले से निर्धारित न किया था न हो सका .
सुन्दर ही होंगे सारे रंग ,मैं दावे से नहीं कह सकता। रंगो का ,भावों का अनुपात भी सम्पूर्ण ही होगा मैं नहीं बता सकता। दावा भी नहीं कर सकता। सब कुछ , सभी जगह नैतिक ही होगा, यह भी मैं दावे से नहीं कह सकता। .
बहुत सी चीजें ऐसी होगी जो नहीं होनी चाहिये , पर हो गयी , जाने में हुई या अनजाने में - सही सही पता भी नहीं , पर कुछ थी , कुछ है , शायद आगे भी कुछ ऐसा रहे।
पर एक  बात स्पष्ट थी , है और रहेगी की दुष्ट या दूषित मानसिकता न तब थी , न अब है , न आगे कभी रहेगा . पापी जैसी किसी भावना से कभी ग्रसित रहा ही नहीं .
पाप हुआ होगा - नहीं हुआ होगा, इसका दावा मैं नहीं करता।  पाप आज भी हो ही जाता होगा - आगे भी होगा ही - पर पापकी विवेचना , प्लानिंग , विचार , उसी में डूबना-तैरना यह नहीं था , न है , न होगा।
एक उम्र थी गुणों को सीखने धारण करने की , दूसरी आई अवगुणों से बचने की ,फिर आई गुणों  को सीखाने की -अब आई अवगुणों से बचाने की .
इस अवस्था में यदि मैं संगोंपंग बिना किसी डर-भय के ,शर्म के सच-सच सब कुछ सभी को बता जाता हूँ या बताऊँ तो हो सकता है मेरे मूल्यांकन में आपको अतिरिक्त भ्र्म  हो जाए कि जिन्हें मैंने या हमने इस एवज में इतना ऊँचा मुकाम दे दिया था वे जब अपनी ही कहानी -जीवन यात्रा  के विवरण में इसे काट रहे हैं तो हमारा मुल्यांकन गलत हो रहा है - इस खतरे के बाद भी यदि  सच यदि एक ब्यक्ति कर साथ का भी हो तो उसे सामने आ जाने दीजिये .
यदि इसमें ऐसा कुछ आपको कभी मिल भी जाएकि आप मुझे कुछ और बेहतर मुल्यांकन या सहृदयता या प्रेम के लायक समझने लगे तो मेरी आप से प्रार्थना होगी की मेरा मुल्यांकन निष्ठुर -निर्दयी -निर्ल्लज्ज भाव से करे -बिना कोई दया -माया दिखाये .मुझे कोए फर्क नहीं पड़ेगा .मैं अभ्यस्त हूँ -उछ्त्मपेक्षा का और निम्नतम उपेक्षा का . मजाक आयर ब्यंग अब मुझे पीड़ा नहीं देते . अस्वीकृति मेरी नियति है - मैंने इसे बहुत पहले से -शायद बचपन से ही स्वीकार लिया है यद्यपि मैं रोज एक  कदम चलूँगा ,अपनी ताकत भर  सही चलूँगा ,मैं एक इंट रोज नई सजा कर ,सम्भाल कर सोच समझ कर आने वाले कल के लिये रखूँगा पर केवल अपने संतोष के लिये - आपको -आप सब कोआरम पहुँचाने के लिये. बस इतना ही कर चले जाने के लिये . यदि मैं चला ही जाऊं तो कम से कम एक बात के लिये इत्मिनान रहना - मैं जिया - करते हुए जिया, बनाते हुए जिया ,बचाते हुए जीया - बिगाड़ा नहीं -कभी भी किसी का नहीं .
हाँ लोभ से मेरी कभी पटरी नहीं बैठी . मैं उससे लड़ते ही रहा हूँ .
दो-चार इंट और रख ही दिया है मैनें- बस कोशिश यही रहती है -हर रोज एक नई इंट कहीं सिलसिले से , करीने से रखता रहूँ   .
आज फिर दो-चार कदम चलने का मन करता है .एक एक कदम चलते एक   रहने से ही तमाम दूरियाँ दूर होती जाती है .बस चलने का मन बने रहना चाहिये चलते रहना चाहिये .. रुकने के ठीक पहले  और बाद बस एक कदम और चल देना है - रुकना नहीं , थकना नहीं -बस चलते ही चले जाना है .
हाँ  ध्यान रहे -सिलसिले से जाना है , सम्भल कर ही जाना है ,निरंतर चलना है .




सचमुच लद जाना , लदे रहना , लदते रहना सहज सा तो है ही न .
लड़ना ,लड़े -भिड़े रहना ,लड़ते-भिड़ते  रहना थोड़ा कठिन तो है ही न .इसमें जुगत भिड़ानी पड़ती है -पराक्रम लगाना पड़ता है -जगना जगाना पड़ता है
दोनों ही विकल्प तुम्हारे पास है ,जो चाहो स्वीकार करो .
लदते तो रहे ही हो पीढ़ियों से ,आज और अब  तक,अब आगे कब तक ?
लड़ोगे कब ,लादोगे कब ,लदवाओगे  कब - या कभी नहीं ,बस लाश बने टंगे रहोगे -पड़े रहोगे . क्या यही शोभा देता है .
हार-जीत के डर से भागे फिर  रहे हो - भार का भय है ! .
तय यही तो करना है - बहार बनना या भार बनना - सुरक्षित होंना या  स्वरक्षित होना .
आपके जाने के बाद ही आपकी चर्चा हो  सकेगी ,पर यह चर्चा एवं इसका स्वरूप इस बात पर निर्भर होगा की आपके बाद की पीढी कितनी सक्षम है ..आपका अपना यश अथवा अपयश ही नहीं ,बाद वाली पीढ़ी के साधन ,मानसिकता आदि भी आपकी छवि बनने-बनाने  , बिगड़ने बिगाड़ने - में सहायक अथवा बाधक होंगे . दुसरे केवल इस  बात पर आपके बारे में कोई धारणा बनाते हैं या प्रकट करते हैं कि आपने अपने आप को उनके हवाले उनके लिये कितना किया ,अथवा नहीं किया .
आप खुद कैसे जीए या रहे , यह उनके लिये कोई खास महत्त्व की बात नहीं हैं .
वे आपको शहीद कहेंगे क्यों की आप उनकेलिए मरे .उन्हें अपना भविष्य चाहिये ,चाहे इसका मूल्य  वर्तमान का सम्पूर्ण अस्तित्व ही क्यों न हो .
हर वर्तमान भूत के अवदान पर ही खड़ा होता है