Monday, 16 March 2015

दो ही विकल्प है - समेटो या बांटों .
चलते चलो या रूक जाओ .
डील क्या चीज में करना है - दो ही विकल्प है - कोमोडिटी या विचार . 
बात किसकी करनी है -यथार्थ या कल्पना की .
तय तुम्हे ही करना है - साथ पाँव मारोगे ,संघर्ष करते रहोगे तो बच सकते हो -शायद न भी डुबो 
-लड़ोगे या भाग जाओगे - बस यही दो तो विकल्प है .
साथ किसके रहना है , साथ किसके चलना है - विक्ल्प बहुत कम है - अब निर्णय तो करना ही है

मैं समझता हूँ आपकी परेशानी . मैं एक साथ शिक्षक और विद्यार्थी दोनों बना रहता हूँ - इनपुट आऊटपुट दोनों साथ चलता रहता है - वन वे ट्रैफिक वालों को परेशानी होती है .
एक ही तार से एक ही समय में उर्जा का आना और जाना सभी के पल्ले नहीं पड़ता - अविश्वसनीय लगता है - 
पर ऐसा होता है , किया जा सकता है ,
आप भी कर सकते है ,
इन्टर मोड , डिलीट मोड़ , रिकवरी मोड़ , सेव मोड , फ़िल्टर मोड ,प्रोग्रामिंग , मॉडरेशन ,डाटा फीडिंग ,डेटा चेकिंग ,अपलोड ,डाऊनलोड ,स्कैनिंग ,दीवायार्सिंग ,फोमतिंग एक साथ किये जा सकते है .टुकड़े टुकड़े सिस्टम ( जीवन ) को फिर से गढ़ने की कोशिश की जा सकती है ,नष्ट हो चुके सिस्टम से भी कुछ तो उपयोगी निकाला ,खोजा , बचाया ,रीकन्स्त्रक्त किया ही जासकता है .
सब कुछ एक साथ कभी भी न खत्म हुआ है न होगा ,
प्रलय भी आ जायेगा तब भी नहीं ,कयामत की रात भी नहीं.
 आम तौर पर एक उम्र  होने के साथ अथवा एक मुकाम  पर पहुँचने के बाद लोग सीखना बंद कर देते हैं।
मेरा मामला कुछ  अलग है।  मेरे साथ उल्टा ही हुआ  है।
स्थापित और ऊम्र  होने के बाद और समय के साथ साथ  साथ सीखने की मेरी  चाहत बढ़ती  चली  गई है। इन दिनों मैं अधिक सीखने लगा हूँ । जरूरत पड़ने पर सिखाने को भी तैयार रहने लगा हूँ।  नहीं जानता - अब तक कितना ,कैसा और क्या क्या सीखा !
रही बात सिखाने की। वह तो आप जाने। मैं कुछ सीखा भी पाऊंगा या नहीं और आप कितना -क्या -क्यों सीख भी पायेंगें। . 
 हर इंसान का एक स्थायी भाव होता है। उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों के बावजूद वह भाव बना रहता है। श्रेष्ठ स्थायी भाव जिज्ञासा है।  जिज्ञासु  आजन्म छात्र रहते  हैं और आगे भी बने रहेंगे। अपनी जिज्ञासाओं की वजह से वे  हमेशा खुद को नए सिरे से खोजा करते हैं  और सफल होते  रहते हैं । जिंदगी की मामूली चीजों के बारे में भी वे इतनी संजीदगी से सोचते , खोजते , जांचते हैं और  बता सकते हैं कि आप चकित रह जाएंगें । ’ 
तुम्हारे साथ बिताया बचपन ,मेरा अपना ,तुम्हारा ,और तू सब का क्यों अभी और अब याद आ रहा है जब की मुझे पता है वह सब इतिहास बन चूका है - पर नासमझ मन है कि मानता ही नहीं - अपनी ,तुम्हारी ,तुम सब की नादानियाँ ,शरारतें ,वो अड़ना ,वो लड़ना और फिर से खेल खेलना - न रात देखने ,न दिन ,न सही की समझ -न गलत की .
बहुत याद आती है कि हमें झूठ की समझ बहुत बाद में हमारे पूज्यवरों  ने सिखाई -समझाई थी .जब तक नहीं समझे थे हमारे पूज्यवर हमे सीधा नासमझ कहते थे . 
बहुत खलता है कि जैसे जैसे हम कुटिल हुए हमारे पूज्य की बांछे खिलती गई . 
वाह रे योग्यता का पैमाना !!!
मुझे अपने छोटे सपने पर गुस्सा क्यों नहीं आता ? 
मेरे सपनों में क्यों है : नए चावल के भात की महक , गेहूं की गदराई बालियाँ, आग में पकाए गए ताजे आलू का सोन्हा स्वाद, ,तालाब की छोटी छोटी कच्ची -पक्की मछलियों का स्वाद,झोल , मकई के आंटे का रुखा पन ,बाजरे की रोटी सिकने पर आ रही सुगंध ,पखाल भात की याद ,आलू चोप-मुढ़ी ,छोटा-बड़ा पाव ,रसम ,इडली । 
पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ , और उसकी बनाई रोटियों की ही सपनीली याद क्यों आती हैं । किसी महानगर के दस x दस के कमरे में बारह लोगों से देह रगड़ते हुए मेरे सपनों मे कोई राजकुमारी नहीं आती और मुझे इस पर शर्म भी नहीं आती .
सबसे बड़ा सपना कहीं खो सा जाता है , उसमें बहुत सारी छोटी -छोटी उम्मीदें पोटली में भरी होती है। ये पोटलियाँ भी कई बार इधर -उधर हो जाती है ,उलट पुलट जाती है। यह भी सही है की इनमे से कई पोटली फटी -चुटी है। मैं जानता भी हूँ। पर मुझे इन सब पर कभी झेंप नहीं हुई।
मैं छोटा तो मेरे सपने छोटे। मेरे सपनों में राजा,रानी ,हीरे , मोती ,नौलखा हार नहीं आता.। नहीं बनता कोई स्वर्ण महल मेरे सपनों में और रोज मैं अपने छोटे छोटे सपनों के साथ इतमिनान से खाते खाते सोता हूँ .।
मेरे सपनों में आता है बरसात में एक पक्की छत, जो टपकती नहीं है। उसके नीचे अभिसार पश्चात नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी । बस साफ कपड़े पहने साईकिल से स्कूल को जाते बच्चे , और बहन की शादी पर देने के लिये एक मोटर साईकिल .बस मैं इतने से मगन हूँ .
मुझे नहीं चाहिये वे बड़े बड़े सपने जो मेरा चैन छीन ले ,मेरी हंसी छीन ले ,मेरे अपनों को मुझसे छीन ले , मेरा खुद पर और तुम सब पर भरोसा , एतबार छीन ले।
हजारो साल से छोटे छोटे सपनों को जी जी कर हमने यह खूबसूरत दुनिया बसाई है , बनाई है , बचा रखी है।
इन्हीं छोटे सपनों ने गंगा को गंग मईया बनाया ,धरती को धरती मईया बनाया , समुद्र को , जंगल को ,पर्वत को ,हवा-, पानी को ,पशु -पक्षी को .आज तक अक्षुण रखा है। हम छोटे सपने वाले हैं ,कछुए ,मछली ,सूअर , गाय ,सिंह ,बगुला ,चूहा ,मोर ,हंस ,कौआ ,सब को बचा कर रखते हैं.
तुम्हारे बड़े सपने तो मुझे ही मार रहे है। मैं फकत इकाई बन कर नहीं रहना चाहता .
मुझे मेरा सम्पूर्ण जीवन जीने दो ,चाहे वह छोटा ही हो .
मैं बहुत बड़े का एक टुकड़ा बनूँ ,यह सपना नहीं देखूंगा .