Friday, 7 February 2014

ठूंठ सा पेड़ ,उदास सा पाखी
रुंध गया कंठ ,किसे बांधू राखी।

हर शाख पर पत्ते आने दो ,
हर पक्षी को झूम कर गाने दो
हर प्रयास को मंजिल पाने दो
हर साँस को जीवन हो जाने दो।

सपने सपने सी यह दुनियाँ
हर हाथ को सपने बुनने दो
अपनी अपनी सी यह दुनियाँ
हे सख्श को अपना चुनने दो।

चपल चंचल कलम सी दुनियाँ
हर राही को कलाम -राह जाने दो
रहे न अब कोई बचपन सूना
हर आँख में सपना मचलने दो।

हर शब्द को एक तो माने दो
हर कंठ को बस यूँ गाने दो
प्रकम्पन ऐसा प्रबल उठे अब
सब कुछ एकाकार  हो जाने दो।  
मानवीय सम्बन्ध भावों में मेरी समझ में सर्वश्रेष्ठ भाव है शिक्षक भाव।
शिक्षक भाव गुरु भाव नहीं है।
 गुरु और शिष्य के बीच एक दासता का सम्बन्ध होता है। यह अधीनता द्योतक संबंध उत्पन्न  करता है। गुरु और शिष्य  के संबंध में या तो शिष्य पर गुरु की छाप पड़ जाती है, या गुरु शिष्य को अपने समान कर  लेता है।  गुरु शिष्य सम्बन्ध में शिष्य गुरु के अतिरिक्त अन्य कोई  जिज्ञासा नहीं रख पाता।
शिक्षक अपने विद्यार्थी को किसी अधीनस्थ भाव में नहीं रखता। शिक्षक शिक्षा देता है ,ज्ञान का दान नहीं।
दान ,दया ,करुणा ,क्षमा -इन सभी भावों में कहीं न कहीं दाता  का अहंकार छिपा होता है। श्रेष्ठता का अहंकार।
शिक्षक के पास यह अहंकार नहीं होता। और इसी कारण  शिक्षक विद्यार्थी से स्थायी गुरु शिष्य सम्बन्ध नहीं बनाता।
शिक्षक  विद्यार्थी को सीमा में बांधता नहीं है।
गुरु हो सकता है , शिष्य को अपने समान बना ले , कर ले आप समान।  पर शिक्षक विद्यार्थ को अपने  से श्रेष्ठ  बनने के लिए ललकारता है ,अपने भर शिक्षा दे कर मुक्त कर देता है।
शिक्षक नहीं चाहता की उसका विद्यार्थी जीवन भर उसकी स्टाम्प लेकर दास्य भाव से घूमता रहे।
शिक्षक विद्यार्थी के स्वतंत्र व्यक्तित्व का अभ्यर्थी होता है।
शिक्षक अप्रिय भाव  से प्रशिक्षण देता है। वह अपने विद्याथी से मान्यता की कामना नहीं करता। शिक्षक दक्षिणा की कामना नहीं करता।
शिक्षक विद्यार्थी को स्वतंत्र कर उसको और ऊंचाइयों पर देखना चाहता है। शिक्षक नहीं चाहता की विद्यार्थी उसका ही गुण -गान करे तथा उसके वाद , सिद्धांत  या विचारों से बंध कर उसी का प्रचार करे ,
शिक्षक शोध को प्रोत्साहित करता है , विद्यार्थी को अपनी सीमा से बाहर ले जा कर स्वतंत्र कर  देता है।
गुरु तथा शिक्षक दोनों के धर्म अलग अलग होते हैँ

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मिडास उतर आया है जमीं पर हर जगह , बढ़ गई है भीड़ ,
बिल्लियों ने भी अब हर खम्भा नोचना बंद कर  दिया है।

धृतराष्ट्र उतर आया है जमीं पर हर जगह , बढ़ गई है भीड़
संजयों ने अब  हर महाभारत देखना ही   बंद कर  दिया है।

दुःशासन  उतर आया है जमीं पर हर जगह,द्रौपदी बेचारी
कृष्ण ने अब स्खलित द्रौपदी चीर बढ़ाना बंद कर दिया है।

इसी भीड़ द्वारा कुचल दी जाउंगी, जान कर अब तो राधा,
नौ मन तेल होने के पहले ही नाच शुरू कर दिया करती है।   

Tuesday, 4 February 2014

राजनीति बुराई है। केवल बुराई है।  इसकी यदि कोई आवश्यक मात्रा है तो वह मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। मनुष्य को विशेष रूप से राजनैतिक रूप संवेदनशील होने से बचना चाहिये। जिस प्रकार सामान्य स्थितियों में शारीर  के लिए आवश्यक लवण ,खनिज , आदि हमें सामान्य भोजन में मिल ही जाते हैं उसी प्रकार सामान्य राजनैतिक दृष्टि व्यक्ति को सामान्य सामाजिक व्यवहार में सहज ही प्राप्त हो ही जाती है।
जिस प्रकार भोजन में अतिरिक्त रूप से उपर से सीधे नमक,चीनी ,घी आदि लेना उचित नहीं है उसी प्रकार सीधे राजनैतिक प्रशिक्षण प्राप्त करना भी उचित नहीं है।
राजनीति का आधिक्य अन्य नीतियों को दूषित करता है।
धर्म नीति ,शांत तत्व है। समाज नीति , परिवार नीति ,सभी सामूहिक नीतियाँ है।
पर राजनीति में स्वार्थ तत्व इतना वेगवान हो जाता है कि इसके  वशीभूत अर्जुन द्रोणाचार्य का वध कर
 डालता है. भीष्म अकर्मण्य हो जाते है। अशोक चण्डाशोक बन जाते हैं। ओरंगजेब पितृद्रोही हो जाते  हैं। विभीषण भतृद्रोही बन जाते है। राजनीति में पवित्रता नहीं रह जाती।
अतः जहाँ तक हो ,जितना सम्भव हो जितने क्षेत्रों में जितना संभव हो ,उन्हें राजनीति से बचाया जाना चाहिये। राजनीति के प्रभाव या छाया तक से बचाया जाना चाहिए।
शिक्षा ,शोध ,विज्ञानं आदि के क्षेत्रों में राजनीति का प्रवेश अनुचित है।
राजनीति ,अर्थात राजा की नीति ,अर्थात वह निति जो  प्रजा की नहीं है ,रजा की है।
राजनीति  अर्थात जिसके पीछे राज ,रहस्य हो अर्थात जो पारदर्शी नहीं हो।
राजनीति अर्थात राज्य नीति  अर्थात व्यक्ति की नहीं ,राज्य की नीति।
राजनीति गुप्त नीति है ,सर्व साधारण के लिये धारण करने योग्य नहीं है।
वैसे यह भी सही है कि राजनीति के प्रभाव को राजनीति से ही काटा जा सकता है,रोका जा सकता है।
सच तो यह है कि राजनीति समाज में अंदर तक प्रवेश कर चुकी है। सारी जगहों पर राजनीति विदयमान है।
पहले की राजनीति के दुष्परिणामों को कैसे दूर किया जाये ,यह गम्भीर चिंता तथा चिंतन का विषय है। यह आज की राजनीति  का विचारणीय विषय है।
किन्तु आज की राजनीति के अपने परिणाम ,दुष्परिणाम  भविष्य में होंगे।
पूर्व का स्वार्थ आज विष बेल  बन कर खड़ा है। आज क्या स्वार्थ नहीं है ?
आज का स्वार्थ भविष्य में विष वृक्ष बन कर समस्या नहीं बनेगा ,ऐसा कौन कह सकता है। स्वार्थ ,स्वार्थी ,तथा उनका समूह बड़ा ही आकर्षक होता है ,उनका वर्त्तमान बड़ा सुगठित ,सुंदर  होता है। स्वार्थ में बड़ी तीब्रता होती है। राजनीति स्वार्थ की संगिनी है। राजनीति अनेकानेक श्रृंगार  करती है।
राजनीती को विद्यालयो में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिये। शिक्षकों को भी राजनीति से बचना चाहिये।
पर राजनीति आवश्यक भी है।  यह विरोधाभाषों को साधने की कला है। यह परस्पर प्रतियोगी संस्थाओं को लेकर एक बड़ी संरचना खड़ी करने का पराक्रम है। यह निर्माण की ही एक विधा है जो दीर्घकालिक निर्माण की दिशा निर्धारित करती है।


   
जितनी ऊर्जा हमने इतिहास चिंतन और उसके महिमामंडन पर खर्च की है उसका एकांश भी यदि हमने वर्त्तमान के निर्माण या भविष्य के निर्माण के लिये किया होता तो स्थिति ही और होती।
मेरा विरोध इतिहास  के प्रति अनावश्यक ममता से है। मेरा विरोध चिंतन की दिशा से है। मेरा विरोध भूतलक्षी दृष्टि से है ,मेरा विरोध बेहोशी से है। मेरा विरोध यथास्तिवादियों से है।
जीवन के मोह में कायर बन जाना उचित नहीं।  मेरा विरोध घिसट घिसट कर जीने से है।
मेरा लक्ष्य भविष्य के लिये मृत्यु है। मैं संतोष के साथ जीना नहीं चाहता। मैं भविष्य के लिए मरना चाहता हूँ। भविष्य के लिए कैसे मरा जाये ,यह सीखना चाहता हूँ। मैं मरने की कला का विद्यार्थी हूँ। नहीं जनता हूँ  कि सही ढंग से मर भी पाउँगा या नहीं।
पर मेरी समझ में आदर्श भविष्य के लिये इस जीवन का त्याग ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है।
मैं इतिहास के साथ साथ तो चल सकता हूँ पर इतिहास के आगे या पीछे नहीं। इतिहास को मई अपनी पीठ पर ढोना तो मई कत्तई बर्दास्त नहीं कर सकता।
मैं वर्त्तमान में जिऊंगा , पूरी ताकत से जिऊँगा और केवल भविष्य के लिये मरुंगा।
वैसे मेरी समझ में भूत, भविष्य और वर्त्तमान में कोई बहुत अंतर नहीं है। एक छोटे से अंतराल में इन तीनों को सहज ही समझा जा सकता है।
इतिहास केवल दो चार हजार साल पुराना ही नहीं होता ,दो चार सौ साल पुराना ,दो-चार  साल पुराना भी इतिहास ही होता है।
दो-चार साल पुराना ही क्यों ,दो चार महीने पुराना भी तो हो सकता है ,दो- चार  घंटा,, दो चार मिनट , दो चार पल भी तो है ही न।
इसी प्रकार भविष्य भी दो चार घंटे या दो चार महीने की ही बात नहीं हुआ करता ,दो चार हजार साल के बाद वाला भी भविष्य ही है।
वर्त्तमान के दो हिस्से है ,एक भूत हुआ जा रहा है ,दूसरा भविष्य से आ रहा है। एक भविष्य है , दूसरा भूत हो जायेगा। एक वर्त्तमान था ,एक वर्त्तमान हो जायेगा।
हम स्थिर हो कर बैठ जाये तो अज्ञात भविष्य को वर्त्तमान होते देख पाएंगे। उसे भूत होते भी देख पाएंगे। न भविष्य ज्ञात है न भूत पुनः प्रकाश्य।
भविष्य की कल्पना कीजिये।तर्क शास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर भविष्यवाणियाँ कीजिये ,यदि कोई तुक्का मिल जाये  तो खुश होइए। सम्मानित हो जाइये।  पर भविष्य को जानने का दवा करते करते भी आप मानियेगा कि यह अपूर्ण है। अनिश्चित है ,सत्य से अधिक दूर है। असत्य के अधिक करीब है ऐसा दावा।
इसी प्रकार जो कुछ भूत हो गया उसे देखते रहिये अपनी यादों से ,बस। वह दूबारा तो लौट कर नहीं आएगा। कितना भी आप कह लीजिये ,कि जो गुजर गया वह बहुत याद आ रहा है , वापस तो आने से रहा।
सच तो यह है कि आपने तो अपनी ताकत भर जो गुजर गया उसे केवल जाने ही नहीं दिया वरन आपने उसका जाना सुनिश्चित किया। आपने तो उसका अस्तित्व ही नष्ट कर दिया। उसके होने के प्रमाण तक मिटा डाले। क्या यह सत्य नहीं है कि जो अभी कुछ समय पहले तक सत्य था ,वर्त्तमान था  और अभी -अभी भूत हुआ है उसे आपने अपने ही हाथों से हजारों डिग्री सल्सियस तापक्रम  के बीच राख बना देंगे। क्या फर्क पड़ता है ,यह तापक्रम चन्दन की लकडियो से पैदा हुआ हो या बिजली की भट्टी में।
आपका तो एक ही उद्देश्य था ,जोई वर्त्तमान अभी अभी भूत हुआ है उसका प्रमाण मिटा देना। उसको राख  बना देना।
जो अभी अभी वर्त्तमान था उसे अपने ही हाथों जमीन के अंदर दस फीट अन्दर दफन कर देते है। यों तो जमीन के अन्दर दस फीट की यात्रा में सैंकड़ों , हजारों , करोड़ों  वर्ष लग जा सकते हैं। पर आप अपने ही हाथों आसन्न भूत को पूर्ण भूत ,सम्पूर्ण भूत ,अनंत भूत  बना देना चाहते हैं। अभी -अभी मनों मिटटी लाद कर आये हैं ,और आपखते हैं -बहुत याद आती है।
वैसे आपको उदास होने की आवश्यकता नहीं हैं। वर्त्तमान को भूत होने से कोई नहीं रोक सकता। भूत वर्त्तमान में नहीं लौटा करता।  वर्त्तमान की नियति ही है कि वह भविष्य से आएगा  और भूत हो ही जायेगा।
वर्त्तमान को भूत का अमृत पिला कर ,या कोरामिन पिला कर जीवित रखने का प्रयास कितना सार्थक होगा , पता नहीं।
वह भूतकालजो अपनी रक्षा नहीं कर सका ,हमारे भविष्य की रक्षा क्या करेगा।
वैसे अपनी अक्षमता छिपाने के लिए भूतकाल की छींटदार चद्दर अच्छी है। ओढ़ लीजिये , पर इस जर्जर चद्दर से क्या वर्त्तमान की गर्मी ,वर्षा ,जाड़े  आने बंद हो जायेंगे ?
भूतकाल के गौरव की चद्दर या पन्नी ओढ़ लेने से क्या आपका वर्त्तमान सुरक्षित हो जायेगा ? भूतकाल का स्मरण कर क्या आप भविष्य के विरोध से बच सकते हैं ?  










Monday, 3 February 2014

आस्था की सम्भाव्यता ही ईश्वर दर्शन है।
आस्था ही प्रयास का सम्बल है ,आधार है।
आस्था ही आशा  है ,आशा ही शक्ति है।
आस्था विश्वास ,आश ,प्रयास ,सभी कुछ है। 
नये की ओर देखो तो सही
सुनो बातें कुछ अनकही
नया है, पहले दिखा नहीं
नया है, पहले देखा नहीं
नया है, पहले कहा  नहीं
नया है, पहले सुना  नहीं
तभी तो नया ,नया है
नये की ओर देखो तो सही।

हर पानी नया हर लहर नई
हर पल नया हर सुबह नई
हर नाद नया ,हर तान नई
हर पत्ता नया ,ये बहार नई
गया पुराना ,ये दुनिया नई
जो सुना न था ,सुनो तो सही
जो कहा न था ,कहो तो सही
अब तो कहो ,नया है ही सही।

पुराने को छोड़ो जरा ,आगे बढ़ो
पुराने को यहीं छोड़ ,ऊपर चढ़ो
स्वागत नये का  तुम अब करो
नये के सर न अपना दोष मढ़ो
नई इबारत लिखी जो नये ने
,उसी को अब एहतराम से पढ़ो.