Monday, 16 March 2015

मुझे अपने छोटे सपने पर गुस्सा क्यों नहीं आता ? 
मेरे सपनों में क्यों है : नए चावल के भात की महक , गेहूं की गदराई बालियाँ, आग में पकाए गए ताजे आलू का सोन्हा स्वाद, ,तालाब की छोटी छोटी कच्ची -पक्की मछलियों का स्वाद,झोल , मकई के आंटे का रुखा पन ,बाजरे की रोटी सिकने पर आ रही सुगंध ,पखाल भात की याद ,आलू चोप-मुढ़ी ,छोटा-बड़ा पाव ,रसम ,इडली । 
पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ , और उसकी बनाई रोटियों की ही सपनीली याद क्यों आती हैं । किसी महानगर के दस x दस के कमरे में बारह लोगों से देह रगड़ते हुए मेरे सपनों मे कोई राजकुमारी नहीं आती और मुझे इस पर शर्म भी नहीं आती .
सबसे बड़ा सपना कहीं खो सा जाता है , उसमें बहुत सारी छोटी -छोटी उम्मीदें पोटली में भरी होती है। ये पोटलियाँ भी कई बार इधर -उधर हो जाती है ,उलट पुलट जाती है। यह भी सही है की इनमे से कई पोटली फटी -चुटी है। मैं जानता भी हूँ। पर मुझे इन सब पर कभी झेंप नहीं हुई।
मैं छोटा तो मेरे सपने छोटे। मेरे सपनों में राजा,रानी ,हीरे , मोती ,नौलखा हार नहीं आता.। नहीं बनता कोई स्वर्ण महल मेरे सपनों में और रोज मैं अपने छोटे छोटे सपनों के साथ इतमिनान से खाते खाते सोता हूँ .।
मेरे सपनों में आता है बरसात में एक पक्की छत, जो टपकती नहीं है। उसके नीचे अभिसार पश्चात नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी । बस साफ कपड़े पहने साईकिल से स्कूल को जाते बच्चे , और बहन की शादी पर देने के लिये एक मोटर साईकिल .बस मैं इतने से मगन हूँ .
मुझे नहीं चाहिये वे बड़े बड़े सपने जो मेरा चैन छीन ले ,मेरी हंसी छीन ले ,मेरे अपनों को मुझसे छीन ले , मेरा खुद पर और तुम सब पर भरोसा , एतबार छीन ले।
हजारो साल से छोटे छोटे सपनों को जी जी कर हमने यह खूबसूरत दुनिया बसाई है , बनाई है , बचा रखी है।
इन्हीं छोटे सपनों ने गंगा को गंग मईया बनाया ,धरती को धरती मईया बनाया , समुद्र को , जंगल को ,पर्वत को ,हवा-, पानी को ,पशु -पक्षी को .आज तक अक्षुण रखा है। हम छोटे सपने वाले हैं ,कछुए ,मछली ,सूअर , गाय ,सिंह ,बगुला ,चूहा ,मोर ,हंस ,कौआ ,सब को बचा कर रखते हैं.
तुम्हारे बड़े सपने तो मुझे ही मार रहे है। मैं फकत इकाई बन कर नहीं रहना चाहता .
मुझे मेरा सम्पूर्ण जीवन जीने दो ,चाहे वह छोटा ही हो .
मैं बहुत बड़े का एक टुकड़ा बनूँ ,यह सपना नहीं देखूंगा .
मुझे अपने छोटे सपने पर गुस्सा क्यों नहीं आता ? 
मेरे सपनों में क्यों है : नए चावल के भात की महक , गेहूं की गदराई बालियाँ, आग में पकाए गए ताजे आलू का सोन्हा स्वाद, ,तालाब की छोटी छोटी कच्ची -पक्की मछलियों का स्वाद,झोल , मकई के आंटे का रुखा पन ,बाजरे की रोटी सिकने पर आ रही सुगंध ,पखाल भात की याद ,आलू चोप-मुढ़ी ,छोटा-बड़ा पाव ,रसम ,इडली । 
पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ , और उसकी बनाई रोटियों की ही सपनीली याद क्यों आती हैं । किसी महानगर के दस x दस के कमरे में बारह लोगों से देह रगड़ते हुए मेरे सपनों मे कोई राजकुमारी नहीं आती और मुझे इस पर शर्म भी नहीं आती .
सबसे बड़ा सपना कहीं खो सा जाता है , उसमें बहुत सारी छोटी -छोटी उम्मीदें पोटली में भरी होती है। ये पोटलियाँ भी कई बार इधर -उधर हो जाती है ,उलट पुलट जाती है। यह भी सही है की इनमे से कई पोटली फटी -चुटी है। मैं जानता भी हूँ। पर मुझे इन सब पर कभी झेंप नहीं हुई।
मैं छोटा तो मेरे सपने छोटे। मेरे सपनों में राजा,रानी ,हीरे , मोती ,नौलखा हार नहीं आता.। नहीं बनता कोई स्वर्ण महल मेरे सपनों में और रोज मैं अपने छोटे छोटे सपनों के साथ इतमिनान से खाते खाते सोता हूँ .।
मेरे सपनों में आता है बरसात में एक पक्की छत, जो टपकती नहीं है। उसके नीचे अभिसार पश्चात नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी । बस साफ कपड़े पहने साईकिल से स्कूल को जाते बच्चे , और बहन की शादी पर देने के लिये एक मोटर साईकिल .बस मैं इतने से मगन हूँ .
मुझे नहीं चाहिये वे बड़े बड़े सपने जो मेरा चैन छीन ले ,मेरी हंसी छीन ले ,मेरे अपनों को मुझसे छीन ले , मेरा खुद पर और तुम सब पर भरोसा , एतबार छीन ले।
हजारो साल से छोटे छोटे सपनों को जी जी कर हमने यह खूबसूरत दुनिया बसाई है , बनाई है , बचा रखी है।
इन्हीं छोटे सपनों ने गंगा को गंग मईया बनाया ,धरती को धरती मईया बनाया , समुद्र को , जंगल को ,पर्वत को ,हवा-, पानी को ,पशु -पक्षी को .आज तक अक्षुण रखा है। हम छोटे सपने वाले हैं ,कछुए ,मछली ,सूअर , गाय ,सिंह ,बगुला ,चूहा ,मोर ,हंस ,कौआ ,सब को बचा कर रखते हैं.
तुम्हारे बड़े सपने तो मुझे ही मार रहे है। मैं फकत इकाई बन कर नहीं रहना चाहता .
मुझे मेरा सम्पूर्ण जीवन जीने दो ,चाहे वह छोटा ही हो .
मैं बहुत बड़े का एक टुकड़ा बनूँ ,यह सपना नहीं देखूंगा .
मुझे अपने छोटे सपने पर गुस्सा क्यों नहीं आता ? 
मेरे सपनों में क्यों है : नए चावल के भात की महक , गेहूं की गदराई बालियाँ, आग में पकाए गए ताजे आलू का सोन्हा स्वाद, ,तालाब की छोटी छोटी कच्ची -पक्की मछलियों का स्वाद,झोल , मकई के आंटे का रुखा पन ,बाजरे की रोटी सिकने पर आ रही सुगंध ,पखाल भात की याद ,आलू चोप-मुढ़ी ,छोटा-बड़ा पाव ,रसम ,इडली । 
पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ , और उसकी बनाई रोटियों की ही सपनीली याद क्यों आती हैं । किसी महानगर के दस x दस के कमरे में बारह लोगों से देह रगड़ते हुए मेरे सपनों मे कोई राजकुमारी नहीं आती और मुझे इस पर शर्म भी नहीं आती .
सबसे बड़ा सपना कहीं खो सा जाता है , उसमें बहुत सारी छोटी -छोटी उम्मीदें पोटली में भरी होती है। ये पोटलियाँ भी कई बार इधर -उधर हो जाती है ,उलट पुलट जाती है। यह भी सही है की इनमे से कई पोटली फटी -चुटी है। मैं जानता भी हूँ। पर मुझे इन सब पर कभी झेंप नहीं हुई।
मैं छोटा तो मेरे सपने छोटे। मेरे सपनों में राजा,रानी ,हीरे , मोती ,नौलखा हार नहीं आता.। नहीं बनता कोई स्वर्ण महल मेरे सपनों में और रोज मैं अपने छोटे छोटे सपनों के साथ इतमिनान से खाते खाते सोता हूँ .।
मेरे सपनों में आता है बरसात में एक पक्की छत, जो टपकती नहीं है। उसके नीचे अभिसार पश्चात नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी । बस साफ कपड़े पहने साईकिल से स्कूल को जाते बच्चे , और बहन की शादी पर देने के लिये एक मोटर साईकिल .बस मैं इतने से मगन हूँ .
मुझे नहीं चाहिये वे बड़े बड़े सपने जो मेरा चैन छीन ले ,मेरी हंसी छीन ले ,मेरे अपनों को मुझसे छीन ले , मेरा खुद पर और तुम सब पर भरोसा , एतबार छीन ले।
हजारो साल से छोटे छोटे सपनों को जी जी कर हमने यह खूबसूरत दुनिया बसाई है , बनाई है , बचा रखी है।
इन्हीं छोटे सपनों ने गंगा को गंग मईया बनाया ,धरती को धरती मईया बनाया , समुद्र को , जंगल को ,पर्वत को ,हवा-, पानी को ,पशु -पक्षी को .आज तक अक्षुण रखा है। हम छोटे सपने वाले हैं ,कछुए ,मछली ,सूअर , गाय ,सिंह ,बगुला ,चूहा ,मोर ,हंस ,कौआ ,सब को बचा कर रखते हैं.
तुम्हारे बड़े सपने तो मुझे ही मार रहे है। मैं फकत इकाई बन कर नहीं रहना चाहता .
मुझे मेरा सम्पूर्ण जीवन जीने दो ,चाहे वह छोटा ही हो .
मैं बहुत बड़े का एक टुकड़ा बनूँ ,यह सपना नहीं देखूंगा .
मुझे अपने छोटे सपने पर गुस्सा क्यों नहीं आता ?
 मेरे सपनों में क्यों  है : नए चावल के भात की महक , गेहूं की गदराई बालियाँ, आग में पकाए गए ताजे आलू का सोन्हा स्वाद।  पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ , और उसकी बनाई रोटियों की ही सपनीली याद  क्यों आती हैं । किसी महानगर के दस x दस के कमरे में बारह लोगों से देह रगड़ते हुए मेरे सपनों मे कोई राजकुमारी नहीं आती और मुझे इस पर शर्म भी नहीं आती .सबसे बड़ा सपना कहीं खो सा जाता है , उसमें बहुत सारी छोटी -छोटी उम्मीदें पोटली में भरी होती है। ये पोटलियाँ भी कई बार इधर -उधर हो जाती है ,उलट पुलट जाती है। यह भी सही है की इनमे से कई पोटली फटी -चुटी है।  मैं जानता भी हूँ।  पर मुझे इन सब पर कभी झेंप नहीं हुई।  मैं छोटा तो मेरे सपने छोटे।  मेरे सपनों में राजा,रानी ,हीरे , मोती ,नौलखा हार नहीं आता.। नहीं बनता कोई स्वर्ण महल मेरे सपनों में और रोज मैं अपने छोटे छोटे सपनों के साथ इतमिनान से खेते खाते सोता हूँ . । मेरे सपनों में आता है बरसात में एक पक्की छत, जो टपकती नहीं है। उसके नीचे अभिसार पश्चात नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी । बस साफ कपड़े पहने साईकिल से स्कूल को जाते बच्चे , और बहन की शादी पर देने के लिये एक मोटर साईकिल .बस मैं  इतने से मगन हूँ .
मुझे नहीं चाहिये वे बड़े बड़े सपने जो मेरा चैन छीन ले ,मेरी हंसी छीन ले ,मेरे अपनों को मुझसे छीन ले , मेरा खुद पर और तुम सब पर भरोसा , एतबार छीन ले। 
हजारो साल से छोटे छोटे सपनों को जी जी कर हमने यह खूबसूरत दुनिया बसाई है , बनाई है , बचा रखी है। 
इन्हीं छोटे सपनों ने गंगा को गंग मईया बनाया ,धरती को धरती मईया बनाया , समुद्र को , जंगल  को ,पर्वत को ,हवा-, पानी को ,पशु -पक्षी  को  .आज तक अक्षुण रखा है। हम छोटे सपने वाले हैं ,कछुए ,मछली ,सूअर , गाय ,सिंह ,बगुला ,चूहा ,मोर ,हंस ,कौआ ,सब को बचा कर रखते हैं.
तुम्हारे बड़े सपने तो मुझे ही मर्र्हे है। 

Saturday, 14 March 2015

दुआओं , सहारों , बैसाखियों के सहारे खड़े बस इन सहारों की देखभाल करते गुजर जाते है , ये सहारे ही उन्हें अपने वजूद से भी अधिक प्यारे लगते हैं - और आखिर में बिना किसी निशान , पहचान , वर्तमान चलते नजर आते हैं ,और वे सहारे कोई नया यजमान खोज लेते हैं जो अहर्निश बस त्वमेव-माता -पिता त्वमेव करता फिरे .
दुआओं , सहारों , बैसाखियों के सहारे खड़े बस इन सहारों की देखभाल करते गुजर जाते है , ये सहारे ही उन्हें अपने वजूद से भी अधिक प्यारे लगते हैं - और आखिर में बिना किसी निशान , पहचान , वर्तमान चलते नजर आते हैं ,और वे सहारे कोई नया यजमान खोज लेते हैं जो अहर्निश बस त्वमेव-माता -पिता त्वमेव करता फिरे .


My experiences ,experiments ,methodology ,results derived-understood-conceived ,all go to you as if a examinee is submitting his answer book to the examiner-expert.