Wednesday, 21 August 2024

 कृष्ण की  हर बात प्रभावित करने वाली है पर दो बाते मुझे अभिभूत  कर देती है एक  तो उनका अप्रतिम सौन्दर्य उनकी मुरली की तान जिसपर बेबस हैं ब्रज की गोपियाँ उनकी ओर खिंची चली आने को।कोई बंधन स्वीकार नहीं है उन्हे।हजारों हजार गोपियों के साथ उनका नृत्य और उसी समय में राधा जी के साथ उनकी रास लीला सबको लगता कि कृष्ण उन्हीं के साथ है।अलौकिक आनंद देने वाला।दूसरा जब कृष्ण पाण्डवों का दूत बन कर धृतराष्ट्र की राज सभा में पहुंचते है,पाण्डवों के लिए मात्र पाँच गाँव की माँग करते है और इंकार पर युद्ध का

आह्वाहन।कृष्ण धर्म के साथ अधर्म के विरुद्ध खड़े है।तटस्थता के प्रखर विरोधी है कृष्ण।अधर्म के साथ कोई अपना भी खड़ा हो उसके विरुद्ध भी हथियार उठाने की प्रेरणा देते है कृष्ण।धर्म की विजय के लिए युद्ध के नियमों की कभी कभी तिलांजलि देते हुये भी दीखते है कृष्ण।उनमें गजब का वाक्चातुर्य है सबको

पराजित सा करता और मोहता हुआ। ।इस भारत भूमि को एक बार और कृष्ण जरूरत है।

Wednesday, 14 August 2024

 एक सेठ-जी के पास एक ग्राहक कुछ समान लेने के लिए आया। उसने जितने का समान लिया उसमें 10 रूपये कम पड़ गए तो सेठ-जी ने कहा कुछ समान कम कर देता हूँ, हम उधार नहीं देते।


ग्राहक को सेठ-जी की बात बहुत ही बुरी लगी,


बोला कि मेरे घर में तीन-दिन से खाना नहीं बना


मेरा पूरा परिवार भूखा है और आपको रूपयों की पड़ी है।


सेठ-जी ने कहा 5 मिनट रूको, घर से सेठानी को बोलकर भोजन की एक शानदार थाली लगवाकर ले आए और बोले,


पहले भोजन करो तथा जाते समय कुछ भोजन बच्चों के लिए भी ले जाना।


उस व्यक्ति के जाने के बाद जब सेठ-जी के बच्चों ने पूछा पिता जी ये कैसा व्यवहार, 10 रूपये कम पड़ने पर तो


आपने उनका समान कम कर दिया और बाद में भरपेट भोजन तो करवाया ही साथ में और भोजन भी बांध दिया।


आखिर ऐसा क्यों....???


सेठ भी ख़ानदानी था बोला …… बच्चों हमेशा ये सीख याद रखना....


व्यापार करते समय, दया मत करो और


सेवा करते समय, व्यापार मत करो ||

 बहु ,ये मकान तुम्हारी माँ ने दहेज में तो नहीं दिया था ..............

धीरे-धीरे कदमों से चलती हुई मीना जी अपने घर की तरफ बढ़ रही थीं। उन्हें इस तरह लँगड़ाते हुए देखकर पड़ोस में रहने वाली सुजाता जी ने कहा,

"अरे दीदी! क्या हुआ? लगता है आपके घुटनों में दर्द ज्यादा है?"

"हां, उम्र का असर है, दर्द तो होता ही रहता है। दवाइयां लानी थीं इसलिए निकल कर गई थी, वरना घर पर ही आराम कर रही थी।"

"तो आप अकेले क्यों गई थीं दवाई लेने? राजू को ले जातीं।"

सुजाता जी की बात सुनकर मीना जी चुप हो गईं। आखिर कहतीं भी क्या कि बेटा उनके साथ नहीं जाता। पर सुजाता जी को तो उनके घर की सारी बातें पता थीं इसलिए उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा और चुप हो गईं। आखिर बोल-बोलकर क्या किसी के दर्द को कुरेदना।


मीना जी वैसे ही लँगड़ाते हुए अपने घर की तरफ बढ़ गईं। जैसे ही घर में घुसीं, देखा कि उनके कमरे का सामान ऊपर वाले कमरे में शिफ्ट हो रहा था। एक पल के लिए वो तो सोच में पड़ गईं, पर फिर बोलीं,

"अरे, मेरा सामान ऊपर कहाँ शिफ्ट कर रहे हो? मेरा कमरा तो नीचे है ना?"

"है नहीं, था मम्मी जी। हमें उस कमरे की बहुत जरूरत थी। इस कारण से आपका कमरा ऊपर शिफ्ट कर रहे हैं।"

"पर मेरे घुटनों में दर्द रहता है। यूँ सीढ़ियाँ ऊपर-नीचे चढ़ना नहीं कर सकती बार-बार।"

"बाहर घूमने जाने में आपके घुटने में दर्द नहीं होता। ऊपर-नीचे होने में ही दर्द होता है। सब बहाने हैं, रहने दीजिए। आपको ऊपर वाले कमरे में ही जाना पड़ेगा।"

"पर बहू, मैं घूमने नहीं गई थी। मेरी दवाइयां खत्म हो गई थीं। मैं तो अपने घुटनों के लिए दवाई लेने गई थी।"

"देखिए मम्मी जी, मेरी बहन आ रही है। पूरे दो साल का कोर्स है तो दो साल तक वो यही रहेगी और उसे कमरे की जरूरत पड़ेगी इसलिए आपका कमरा खाली कर रहे हैं।"

"अरे, तो उसे ऊपर वाला कमरा दे दो। वो तो जवान है, आराम से ऊपर रह सकती है। मना थोड़ी ना कर रही हूं।"

"मेरी बहन उस छोटे से कमरे में रहेगी? मायके में मेरी भी कोई इज्जत है। और आप मुझे मना करने वाली कौन होती हैं? घर हमारा है। घर का खर्चा हम उठा रहे हैं। हमारा डिसीजन हम किसे कहाँ रखते हैं? ऊपर वाले कमरे से इतनी ही दिक्कत है तो आप बाहर वाले कमरे में रह जाइए। हमें कोई एतराज नहीं है।" बहू नैना ने बड़ी बेरुखी से कहा।


सुनकर मीना जी की आंखों में आंसू आ गए। बेटा राजू सामने ही था लेकिन वह तो बुत बना खड़ा तमाशा देख रहा था। एक बार भी उसने नैना को टोका तक नहीं। और बाहर वाला कमरा? वह तो स्टोर रूम था। मतलब अब मीना जी की ये हैसियत रह गई। बहू कबाड़ की तरह मीना जी को स्टोर रूम में रहने के लिए कह रही थी और नालायक बेटा सामने खड़ा था लेकिन वह कुछ कह नहीं रहा था।


जबसे मीना जी के पति गए हैं तब से बेटा-बहू घर के सर्वेसर्वा बन गए हैं। माना कि घर में खर्चा करते हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि मां के स्वाभिमान को ही कुचल दें जबकि मकान अभी भी उन्हीं के नाम था। अपनी बहू की जबान से ज्यादा मीना जी को उनके बेटे की चुप्पी चुभ रही थी। आखिर बर्दाश्त के बाहर हो गया तो वह बोल पड़ीं,

"बहू, जब तुमने मेरा कमरा लिया था ये कहकर कि मम्मी जी हमें बड़े कमरे की जरूरत है, तब मैंने कुछ नहीं कहा। यह सोचकर चुप रह गई थी कि बेटे-बहू को क्या तकलीफ देना। दोनों मेरे अपने ही तो हैं। लेकिन आज, तुम मुझे स्टोर रूम में रहने को कह रही हो।"

"शुक्र मनाइए कि स्टोर रूम में रहने को कह रही हूं, वृद्धा आश्रम में नहीं भेज रही हूँ। एक तो हमारा ही खाती हो, ऊपर से हमें ही सुना रही हो।"

"बस करो बहू। बहुत बोल लिया तुमने। यह घर आज भी मेरा है। तुम यह मकान अपने दहेज में नहीं लाई थी। और हां, चुपचाप अपना कमरा भी खाली करो। मैं अपने कमरे में वापस शिफ्ट हो रही हूं।"

"अच्छा, घर का खर्चा हम कर रहे हैं तो आपकी दो बातें क्यों सुनें?"

"आज के बाद करने की जरूरत नहीं है। अगर इस घर में रहना है तो किराया दो। अन्यथा घर खाली करके चले जाओ। मैं किराएदार रख लूंगी। मेरे घर का खर्च मैं खुद निकाल लूँगी।"

"मम्मी, तुम अपने बेटे को इस घर से निकलने के लिए कह रही हो?"

"वाह बेटा! इतनी देर से तेरी बीवी जब मेरी बेइज्जती किए जा रही थी। मुझे वृद्धाश्रम छोड़कर आने की बात कर रही थी, तब तुझे सुनाई तक नहीं दे रहा था। और मैंने तुम लोगों से किराया देने को क्या कह दिया, तुम्हें सुनाई देने लगा। मुझे कुछ नहीं सुनना। अब तक यही सोचती रही कि काश एक दिन तुम लोग मुझे समझोगे पर वो दिन कभी नहीं आया। शायद मुझे अकेले रहने से डर लगता था। पर अब नहीं, अब यूँ बेइज्जत होकर साथ रहने से अच्छा है स्वाभिमान के साथ अकेली ही रहूँ। अब जो भी निर्णय लेना है फटाफट लो और कमरा खाली करो। बस।"


ये सब सुनकर बेटा-बहू की हालत खराब हो गई। इतनी जल्दी कहां जाएंगे? दोनों फटाफट मां के पैरों में पड़ गए,

"हमें माफ कर दो मम्मी। प्लीज हमारे साथ ऐसा मत करो।" पर मीना जी ने मन पक्का कर लिया था। वे झुकने को तैयार नहीं हुईं। निरादर की दो रोटी से तो स्वाभिमान की एक रोटी भली। और भला काश के इंतजार में जिंदगी क्यों बितानी?

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और आखिरकार राजू और नैना उसी घर में ऊपर वाले दो कमरों में शिफ्ट हुए और आज भी उसका किराया दे रहे हैं। जबकि नीचे का वह एक कमरा किसी और को मीना जी ने किराए पर दे दिया। रही बात नैना की बहन की तो वह हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई कर रही है।

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Sunday, 4 August 2024

 समझदारी ये समझने में है कि पितृसत्ता स्त्रियों में मित्रता को खतम करता है। उसके विपरीत स्त्रियों में ईर्ष्या, प्रतिस्प्रधा व नफरत को बढ़ावा देता है। ये पितृसत्ता की व्यवस्था है।


शादी के बाद लड़कियाँ अपनी स्कूल-कॉलेज की सहेलियों से दूर हो जाती है। कोई कहाँ, कोई कहाँ। विदाई प्रथा व शादी की बंदिशों की वजह से स्त्रियों के जीवन में सहेली जैसा रहता नहीं कुछ।

पितृसत्ता में रिश्ते कुछ इस तरह बने हैं कि मित्रता तो दूर की बात है, रहती है तो सिर्फ ईर्ष्या, प्रतिस्प्रधा व नफरत - 

शादीशुदा सुहागन में विधवा या डिवोर्सी महिला के प्रति हीन भावना व नफरत

घरेलू महिला व कामकाजी महिला में प्रतिस्प्रधा व नफरत

परिवार में सास बहु, नन्द भाभी, देवरानी जेठानी में ईर्ष्या व प्रतिस्प्रधा व नफरत

मॉडर्न-पढ़ी लिखी महिला व देसी-अशिक्षित महिला में ईर्ष्या व नफरत


पितृसत्ता स्त्रियों को आपस में लड़वा कर ज़िंदा है, समझदारी इसे जल्द से जल्द समझने में है। 

#friendship #FriendshipDay

 हरियाणा में एक व्यक्ति बस यात्रा में साथ की सीट पर बैठी लड़की को हाथ लगा लगा कर या कोहनी से दबा दबा कर छेड़े जा रहा था

काफी देर तक तो वह लड़की शर्म लिहाज़ से चुप रही , पर जब लड़का बढ़ता ही गया तो लड़की ने कह ही दिया

न्यूऐं मान जावेगा कै पिट कै मानैगा 🧐🥱

लड़का अनजान सा भोलू बनकर पूछने लगा

🤔🤔🤔 मैने क्या किया

और यह सुनने के तुरंत बाद ही 🙆लड़की ने तडा़तड़ जूती से पांच सात लड़के के मुंह सिर पर धर दीं

और फिर लड़की बोली , अब तो समझ आ गया

या और अच्छी तरह समझाऊं

बस , फिर तुरंत लड़का बिना कुछ बोले चुप चाप चलती बस 🚍🚌🙏 से उतर फौरन निकल लिया

यही ट्रीटमेंट पप्पू की त्वचा को चाहिए, लक्षण तो बिल्कुल वही हैं और लिख लो ये एक बार अच्छे से इसी तरह का मेकअप करवा ले और साधारण कारावास तीन माह गर्मियों में भुगत ले बिहार के किसी कारागार में , तो आवाज नहीं नहीं निकलेगी अगले दस पंद्रह साल या फिर ये राजनीति छोड़ भागेगा

Sunday, 16 June 2024

 Borrowed


*सेक्स ओर आदमी*


आदमी सेक्स को दबाने के कारण ही बंध गया और जकड़ गया। और यही वजह है पशुओं की तो सेक्स की कोई अवधि होती है कोई पीरियड होता है वर्ष में आदमी की कोई अवधि न रही कोई पीरियड न रहा। 


आदमी चौबीस घंटे बारह महीने सेक्सुअल है सारे जानवरों में कोई जानवर ऐसा नहीं है कि जो बारह महीने और चौबीस घंटे कामुकता से भरा हुआ हो। उसका वक्त है उसकी ऋतु है वह आती है और चली जाती है। और फिर उसका स्मरण भी खो जाता है। 


आदमी को क्या हो गया? 

आदमी ने दबाया जिस चीज को वह फैल कर उसके चौबीस घंटे और बारह महीने के जीवन पर फैल गई है।


कभी आपने इस पर विचार किया कि कोई पशु हर स्थिति में हर समय कामुक नहीं होता। लेकिन आदमी हर स्थिति में हर समय कामुक है। जैसे कामुकता उबल रही है 

जैसे कामुकता ही सब कुछ है। 


यह कैसे हो गया? 

यह दुर्घटना कैसे संभव हुई है? 

पृथ्वी पर सिर्फ मनुष्य के साथ हुई है 

और किसी जानवर के साथ नहीं क्यों?


एक ही कारण है सिर्फ मनुष्य ने दबाने की कोशिश की है। और जिसे दबाया, 

वह जहर की तरह सब तरफ फैल गया। 


और दबाने के लिए हमें क्या करना पड़ा? 

दबाने के लिए हमें निंदा करनी पड़ी दबाने के लिए हमें गाली देनी पड़ी दबाने के लिए हमें अपमानजनक भावनाएं पैदा करनी पड़ीं। 


हमें कहना पड़ा कि सेक्स पाप है। 

हमें कहना पड़ा कि सेक्स नरक है। 

हमें कहना पड़ा कि जो सेक्स में है 

वह गर्हित है निंदित है। 

हमें ये सारी गालियां खोजनी पड़ीं 

तभी हम दबाने में सफल हो सके। 


और हमें खयाल भी नहीं कि इन निंदाओं और गालियों के कारण हमारा सारा जीवन जहर से भर गया।

 

नीत्शे ने एक वचन कहा है 

जो बहुत अर्थपूर्ण है। उसने कहा है कि धर्मों ने जहर खिला कर सेक्स को मार डालने की कोशिश की थी। 

सेक्स मरा तो नहीं सिर्फ जहरीला होकर जिंदा है। मर भी जाता तो ठीक था। वह मरा नहीं। लेकिन और गड़बड़ हो गई बात। 

वह जहरीला भी हो गया और जिंदा है।


यह जो सेक्सुअलिटी है यह जहरीला सेक्स है। सेक्स तो पशुओं में भी है काम तो पशुओं में भी है क्योंकि काम जीवन की ऊर्जा है लेकिन सेक्सुअलिटी कामुकता सिर्फ मनुष्य में है। 


कामुकता पशुओं में नहीं है। 

पशुओं की आंखों में देखें वहां कामुकता दिखाई नहीं पड़ेगी। आदमी की आंखों में झांकें वहां एक कामुकता का रस झलकता हुआ दिखाई पड़ेगा। 

इसलिए पशु आज भी एक तरह से सुंदर है। 


लेकिन दमन करने वाले पागलों की 

कोई सीमा नहीं है कि वे कहां तक बढ़ जाएंगे।