Monday, 7 January 2019

Mr so and so...
I want illegal acts done through you... Legally
I expect honesty, kindness through you while dealing with all sorts of dishonest and cruel transactions.
Will you do ?
Tell me your terms ?
 Sir, if Lord pleases that way let that be..
No terms, only your grace, my lord..
You are in
मेरी शिक्षा क्लास, कुछ पहले --
बाद में समझ में भी आ जायेगा। अभी कहीं सेव कर लो , किसी फाइल में, बाद मैखुद ब खुद रिकवर हो जायेगी और प्रोग्राम खुद रन्त करने लगेगा।
You can acquire superior legal knowledge and use it at your job, which will ensure you always stay miles ahead of everyone.
 It's hard to put in the hours to gain that level of insight for everyone. Moreover,  for every piece of additional legal insight you acquire and use, you race far ahead and keep it for life with yourself.

  1. It widens your competitive advantage.
कभी, कहीं, आपने ही तो अपने ब्यवहार, संकेत, शब्द, आने जाने का समय, वेशभूषा, खाने पीने की स्थिति-चर्या, सार्वजनिक जीवन के या ज्ञात स्वरूप के चलते उसे नहीं उकसाया ?
सावधान रहना ही उचित है।
बिना उकसावे के नहीं होता , सामान्यतः।

  • लोभी भी इसी तरह उकसावे में आते है।

Monday, 24 December 2018

पर्दे में रहना बड़प्पन नहीं, भय की निशानी है।पवित्रता की नहीं ब्यभिचार की निशानी है। पशु, पक्षी को कभी भी किसी समय किसी आवरण की आवश्यकता नहीं होता। फूल पौधों को भी नहीं। नदी नालों  को भी नहीं।
फिर हमको और आपको क्यों ? हम क्यों अपने चारों ओर दीवार पर दीवार, प्रकोष्ठ डर प्रकोष्ठ बना लेते हैं।
न्यूक्लियर बम ताकत नहीं शुद्ध भय का परिचायक है।
यदि भय नहीं होगा तो आपको किसी आवरण की जरूरत नहीं होगी।
सबसे अधिक भय मनुष्य को अपने आप से लगता है।वह पाप करता है।और पाप का फल जानता है। विवेक और स्वार्थ, कर्तब्य और स्वार्थ, अधिकार और लोभ-स्वार्थ के घालमेल भय का कारण है, भय के कारण है।
इसी से स्ट्रेस है, तनाव है।
केवल स्वार्थ के साथ खड़े हो जाइए, स्ट्रेस से बच जाएँगे।केवल विवेक के साथ  हो कर भी स्ट्रेस से बचा जा सकता हसि। पर स्ट्रेस तब आता है जब हम आप स्वार्थ और विवेक दोनों की साधना चाहते हैं।आग और पानी को एक साथ साधना चाहते है।जमीन और आसमान को एक साथ छूना चाहते हैं। क्षितिज को आसमान और जमीन मिलने का स्थान समझ बैठते हैं। आसमान और क्षितिज वहीं मिलते है। बस उधर ही दौड़ गए।जितना मर्जी दौड़ो, क्षितिज तो दूर ही रहेगा। आसमान और पृथ्वी तो मिलते नहीं। यह तो तुम्हारा दृष्टि दोष है। उसी को आप सत्य, वास्तविकता मान बैठे हो। आसमान छोड़ दो, पृथ्वी पर अपने आप आ जाओगे। धरती छोड़ दो, आसमान पर चले जाओगे।
पर धरती, आसमान, आग, पानी, संसार और शिव सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश ही स्ट्रेस का कारण है।
शुद्ध पवित्र हो जाओ, स्ट्रेस गायब।

  1. शुद्ध अपवित्र हो जाओ, स्ट्रेस गायब।क्यों करते हो पवित्रता की चिंता। यदि अपवित्र हो यो वैसे ही दिखो।अपवित्र रहो और स्वीकार करो। वैसा ही दिखो। देखो, स्ट्रेस गायब।
मैंने दिन भर में कुछ देर के लिये बच्चों को फुटबाल खेलते देखा। कुछएक कभी कभार क्रिकेट खेलते भी अब दिख जाते है। गाँवों में ही अब ग्रामीण खेलों के प्रति चाव, आकर्षण लगभग खत्म हुआ चाहता है। बच्चों एवं किशोरों में वर्जित क्षेत्रों के प्रति एक सहज आकर्षण दिखा। वैसे यह आकर्षण शहरी किशोरों में, नवधनाढ्यों में सर्वाधिक दिखा।
देहात के इन बच्चों में मुझे इसी उम्र में ऐसे लक्षण दिखे जो निश्चित रूप से अपराध की दिशा की ओर बोध, संकेत करते हैं।
बहुत करीब से समझने की कोशिश करने पर पता चला कि उन्हें उन दिशाओं की ओर जाने से रोकने वाला, सही या गलत बताने वाला या किसी रचनात्मक काम में उलझाए रखने वाला या उनका सजग सहज मनोरंजन कटने वस्ल कोई है ही नहीं।
वे नए रेखियाते युवक यदि कुछ नया अच्छा करना भी चाहे तो कोई प्रेरणा नहीं, कोई अनुकूलता ही नहीं, और गलत करने पर कोई निषेध, विरोध, प्रतिबन्ध नहीं।
परम् स्वतंत्र न सिर पर कोउ, ऐसी स्थिति में ग्रामीण युवकों में एक निराश ब्याप्त हो ही जातो है।
ग्रामीण स्त्रियाँ या तो गम्भीर रूप से बीमार है और उनकी बीमारी का कोरे ध्यान तक करने वाला नहीं है। ग्रामीण स्त्रियाँ कठोरतम शारीरिक परिश्रम करती रहती है।वह भी लगभग बिना खाये पीये। ग्रामीण स्त्रियों के दो रूप होते हैं। अवकाश के क्षणों में पड़ोसियों से लड़ाई,दूसरा लगातार प्रजनन। ग्रामीण स्त्रियाँ लगातार पुरुषों के स्वाभाविक मनोरंजन की साधन होती है।
वैसे यह स्थिति शहरों मरण भी कमोबेश ऐसी ही है, प्रकार भेद के साथ। ग्रामीण परिवेश में मनोरंजन के साधन बहुत कम है, स्त्रियोचित मनोरंजन ज्ञान के साधन तो है ही नहीं।
भारतीय ग्रामीण परिवेश में स्त्रियों में नीरस निराशा का भाव अधिक प्रखर है। उन्हें न तो कोई सुरक्षा देता, न सम्मान, न प्रेरणा, न निषेध, न सहानुभूति। ये अपने परिवेश में तमाम प्रकार की हिंसा का लगातार शिकार होते रहती है। मैंने तमाम प्रकार की हिंसा शब्द का सजग प्रयोग विशेष कर किया है।
गाँवों में बहुतों के पास अपना रहने का घर तो पीढ़ियों से होता ही है। अनाज, मछली आदि खेत, तालाब, नदी से प्राप्त हो जाते हैं। खेत अपना अर्थात पूर्वजों का हो तो अनाज दूसरों  के परिश्रम से प्राप्त हो जायेगया और खेत अपना नहीं है तो अपने परिश्रम से प्राप्त हो जायेगा। रही बात कपड़े की तो कौन रोज रोज मेला ही घूमना है।
हो गया, रोटी-कपड़ा-मकान का निदान।
शेष बचे समय में क्या करना है, क्या हो सकता है,  कैसे करना है,, भारतीय ग्रामीण परिवेश में इसका कोई सोच ही नहीं है।
मैंने 40-45 सालों से ग्रामीण परिवेश में किशोरों को गाँवों में पेड़ों  के नीचे या तो ताश खेलते या गांजा पीते देखा, खैनी तो बड़ी सहज वृत्ति देखी।