Monday, 24 December 2018

गाँवों में बहुतों के पास अपना रहने का घर तो पीढ़ियों से होता ही है। अनाज, मछली आदि खेत, तालाब, नदी से प्राप्त हो जाते हैं। खेत अपना अर्थात पूर्वजों का हो तो अनाज दूसरों  के परिश्रम से प्राप्त हो जायेगया और खेत अपना नहीं है तो अपने परिश्रम से प्राप्त हो जायेगा। रही बात कपड़े की तो कौन रोज रोज मेला ही घूमना है।
हो गया, रोटी-कपड़ा-मकान का निदान।
शेष बचे समय में क्या करना है, क्या हो सकता है,  कैसे करना है,, भारतीय ग्रामीण परिवेश में इसका कोई सोच ही नहीं है।
मैंने 40-45 सालों से ग्रामीण परिवेश में किशोरों को गाँवों में पेड़ों  के नीचे या तो ताश खेलते या गांजा पीते देखा, खैनी तो बड़ी सहज वृत्ति देखी।

  1. भारत के ग्रामीण जीवन में जो निराश का भाव है, उसका एक कारण ग्रामीण परिवेश में साधनों का अभाव तो हो ही सकता है, परन्तु एक कारण ग्रामीण दृष्टिकोण भी है।

भारतीय सामाजिक संरचना में या तो बहुत तात्कालिक यात्राएँ की जाती है , तात्कालिक लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं या फिर दर्शन शास्त्रीय मुक्ति, मोक्ष आदि के लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं।
या तो बस रोटी, कपड़ा, मकान या फिर सीधे मोक्ष, बीच मरण कुछ नहीं।
मैनें अपने चारों और इस खाई को बड़े करीब से देखा, या तो लोग रोटी-कपड़ा-मकान पर ध्यान गड़ाए हुए रहते हैं या सीधे मुक्ति -मोक्ष पर।
देखिये, ये दोनों ही लक्ष्य अनिष्टकारी हैं।
पहला तो रोटी-कपड़ा-मकान यह थोड़े से सार्थक प्रयास से प्राप्त हो जाता है।
मैनें जीवन से यही सीखा है कि हर या जीत का यह गोरख धंधा तो अनवरत, बिना रुके चलता ही रहेगा। 

लड़ते रहिये, लड़ते रहिये और लड़ते रहिये।
आप लड़ें या न लड़ें, संघर्ष तो सदैव चलना ही है।
आप हार के डर से न लड़ें तो भी आप हार से बच नहीं सकते।
जीत तो कभी होती नहीं।
जिसे आप जीत कहते है यदि उसके बाद आपने लड़ना बन्द कर दिया तो भी हार निश्चित है। हार से बचने का एक मात्र रास्ता है - लड़ते रहिये, लड़ते रहिये और लड़ते रहिये।चलते रहिये, चलते रहिये, चलते रहिये।
जीवन में विश्राम या लक्ष्य जैसा कुछ नहीं होता।जिसे आप मंजिल कहते है वह बस एक नई यात्रा की शुरुआत भर है।
जीवन यात्रा में कोई भी मंजिल इतनी बड़ी नहीं होती कि आप विश्राम कर सकें।
मैं एक युद्ध हार गया। यह इस बात का प्रमाण नहीं है, न हो सकता है कि मैं गलत था या मेरे द्वारा किये जा रहे युद्ध का आधार गलत था।  युद्ध में मेरी जीत या हार अनेक कारकों के एक या अनेक प्रकार से एक ही समय में क्रियाशील या सक्रिय या निष्क्रीय होने के संयोग पर निर्भर करती है।
यदि जीवन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है तो संघर्ष भी समानान्तर चलने वाली प्रक्रिया।
हार या जीत, दोनों ही शब्दों से मुझे चिढ़ सी है।
अपनी हार से उतना मत चिढिये जितना कि अपनी जीत से।
आपकी जीत में किसी की हार छिपी होगी। किसी की भी हार आप की हार या जीत से कम  या भिन्न तो नहीं ही होगी।
देखिये, एक बात स्पष्ट है कि दुश्मन के साथ रहने, लड़ने, उसके स्मरण से किसी न किसी प्रकार आपमें दुश्मन के संस्कार तो आते ही हैं।
दुश्मन हार भी जाये तो भी वह अपने पीछे अपनी सम्पत्ति, अपना घर मकान और अपनी यादें तो छोड़ ही जाता है। यह सब सामान विजय प्राप्त करने वाला उपयोग में लाता ही है। पराजित पक्ष का धन जन विजयी पक्ष भोग करता है। इसी प्रकार पराजित दुश्मन के संस्कार होते है। पराजित पक्ष के संस्कारों का परभव विजयी पक्ष पर पड़ता ही है।
आपका दुश्मन ,दुश्मन इसलिये नहीं है कि वह आपसे बुरा है और आप उससे अच्छे। दुश्मनी का कारण स्वार्थ का टकराव है।
चोर की दुश्मनी पुलिस से इसलिये है क्यों कि पुलिस चोर को चोरी करने से रोकने का प्रयास करती है।चोर पुलिस से बैर रखता है। इससे चोर शुद्ध नहीं हो जाता।
अनेक विचार, अनेक समस्याएँ, अनेक देश, अनेक समूह, दूसरे विचार, दूसरे देश, दूसरी सभ्यता अथवा दूसरे समूह,परस्पर लड़ते झगड़ते रहते हैं। वैमनस्य रखते हैं। दुश्मनी रखते हैं।
पर यह दो विचारों, सभ्यताओं, दो समूहों में पारस्परिक दुश्मनी  या प्रतिस्पर्धा किसी एक कि श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है।
युद्ध का परिणाम भी युद्ध के कारणों का औचित्य सिद्ध नहीं कर सकते। कोर्ट - कचहरियों में मुकदमें जीत जाने से या हार जाने से पक्षकार का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। हर ब्यक्ति की प्रतिरोध शक्ति अलग होती है, मात्रा, प्रकार औऱ प्रकृति में।
हर या जीत का सम्बंध इसी आंतरिक और वाह्य प्रतिरोध शक्ति पर निर्भर होती है।विरोध भी पसंद नापसन्द पर अधिक आधारित है। न कि औचित्य या अनौचित्य पर।

Wednesday, 19 December 2018

कम से कम अपनों के बीच तो परस्पर सम्मान, एकता, मित्रभाव, सहयोगी भाव पैदा कीजिये।
अपनो के प्रति भेद भाव, शोषण की ,घृणा की प्रवृत्ति को दूर कर पाना आपके लिये पूरी तरह सम्भव है।