Wednesday, 9 September 2015
Monday, 7 September 2015
जब भी मैं अपने आप को किसी बन्धन से बान्धने की कोशिश करत् था तो अनेकानेक परस्पर विरोधी शक्तियाँ अत्यन्त तीब्र हो मेरा और मेरे संकल्प का विरोध करने लगती थी .
इसी विरोध के कारण मैंने विरोधी शक्तियों से एक साथ लड़ना सीखा. मुझे स्पष्ट समझ में आया कि यदि मैं बन्धनों से भागूँगा , यदि मैं नंगा हो कर बन्धनों से मुक्त हो ही जाउँगा तो अन्ततः शर्म मुझे ही आयेगी .
मैं किन शब्दों में अपनी माँ के उन निर्देशों का उल्लेख करूँ समझ मेम नहीं आता.
पर हाँ, ुन्होंने बड़े स्पष्ट रूप से बताया था कि जब कभी अपने को बाँधोगे, बाँधे जाओगे ,या ट्रेनिंग के लिये जाओगे तो थोड़ी बहुत असुविधा तो होगी ही .
जिसने दाँत पर दाँत चढ़ा ,दम बाँध, मुट्ठी बन्द , साँस खीँच ,उस असुविधा को बरदास्त कर लिया , स्वीकार कर लिया, वह तो बाद में कंचन हो गया और जो उस ट्रेनिंग काल की असुविधा से घबड़ा गया, भाग गया या जिसने ट्रेनिंग बीछ में छोड़ दी , वह बस गया काम से .उसका जीवन बड़ा दुखःद बीतता है.
इसी विरोध के कारण मैंने विरोधी शक्तियों से एक साथ लड़ना सीखा. मुझे स्पष्ट समझ में आया कि यदि मैं बन्धनों से भागूँगा , यदि मैं नंगा हो कर बन्धनों से मुक्त हो ही जाउँगा तो अन्ततः शर्म मुझे ही आयेगी .
मैं किन शब्दों में अपनी माँ के उन निर्देशों का उल्लेख करूँ समझ मेम नहीं आता.
पर हाँ, ुन्होंने बड़े स्पष्ट रूप से बताया था कि जब कभी अपने को बाँधोगे, बाँधे जाओगे ,या ट्रेनिंग के लिये जाओगे तो थोड़ी बहुत असुविधा तो होगी ही .
जिसने दाँत पर दाँत चढ़ा ,दम बाँध, मुट्ठी बन्द , साँस खीँच ,उस असुविधा को बरदास्त कर लिया , स्वीकार कर लिया, वह तो बाद में कंचन हो गया और जो उस ट्रेनिंग काल की असुविधा से घबड़ा गया, भाग गया या जिसने ट्रेनिंग बीछ में छोड़ दी , वह बस गया काम से .उसका जीवन बड़ा दुखःद बीतता है.
इसी प्रकार जीवन में सफल होने के लिये सफल होने की इच्छा का होना जरूरी है . सफल होने के लिये सब कुछ कर गुजरने का संकल्प आवश्यक है .हफल होने की तीब्र इच्छा के प्रभाव में ही कोई ब्यक्ति सफलता -पथ के स्रे कष्ट झेलता है.
गर्भ धारण करने की , मातृत्व कीउत्कट अभिलाषा- बैचैनी- आवेग ही मातृत्व की इच्छा लिये जीव को असामान्य प्रक्रिया से गुजरने को विवश ही नहीं करती , सफलता पूर्वक उस प्रक्रिया से गुजर जाने, बर्दास्त करने का बल बुद्धि और पराक्रम भी देती है .
गर्भ धारण करने की , मातृत्व कीउत्कट अभिलाषा- बैचैनी- आवेग ही मातृत्व की इच्छा लिये जीव को असामान्य प्रक्रिया से गुजरने को विवश ही नहीं करती , सफलता पूर्वक उस प्रक्रिया से गुजर जाने, बर्दास्त करने का बल बुद्धि और पराक्रम भी देती है .
Sunday, 6 September 2015
धन्य हो मेरी माँ ! वे मुझे एक नौकर के साथ जबरदस्ती चीखते -चिल्लाते-अनवरत- रोते- गालियाँ बकते स्थिति में भी स्कूल जाने को बाध्य करती थी. मेरी माँ भी साथ हुआ करती थी. मैं सड़कों पर हाथ -पैर मारता, चीखता , नौकर के कन्धे पर लगभग लाद कर स्कूल लै जाया जाता, नौकर को मारता , शायद माँ को भि ग्ली बकता- मारता. याद पड़ता है कि मैं कभी कभी रामशरण नाम के उस घरेलू नौकर को दाँत भी काट लेता था. कलकत्ते की ब्यस्त सड़कों पर चिल्लाता मैं और मेरा हाथ पकडे़े या कन्धे पर बैठाये या लगभग दबाये हुै रामशरण और पीछे पीछे मेरी माँ. क्या दृश्य रहा होगा.
मुझे याद पड़ता है, माँ को राह चलते लोग सलाह देते थे कि इस तरह स्कूल जबरदस्ती क्यूँ भेजती हैं.
माँ का उत्तर होता था- यह स्कूल नहीं जाने के लिये ही तो यह सब नाटक ड्रामा कर रहा है, यदि इसे पता चल गया कि इस तरह उछल कूद करने से यह स्कूल जाने से बच जायेगा तब तो यह रोज यही ड्रामा करेगा. तब तो यही इसकी आदत ही बन जायेगी . वह आगे कहती , पर यदि इसे दो चार बार समझ में आ जायेगा कि किसी भी किमत पर इसे स्कूल जाना ही पड्देगा और यह ड्रामा काम नहीं ही आयेगा, तो यह खुद ब खुद आपने को बदल लेगा.
मुझे यह दृश्य आज भी याद है - हू बहू - कलकत्ता के मछुआ बाजार- रविन्द्र सरणी, फूल-कटरा- मारवाड़ी रिलिफ सौसाईटी, बौल की आस्पताल जहाँ शायद मेरा जन्म हुआ था और डीडू माहेश्वरी स्कूल .
बड़े होने के बाद मेरी माँ के मुँह से यह प्रकरण सैंकड़ो बार सुन चुका हूँ.
माँ इस दृश्य को मेरी पत्नी , बच्चों , मेरे जूनीयर , मेरे सिनीयर सभी को कई बार बता चूकी है . सेवा काल में भी माँ ने यह प्ररण बार बार मेरे छोटे -बड़े सभि को कई बार बताया.
अरे हा़ , याद आया , एक बार मैंने सकूल जाते वक्त माँ को धमकी दी कि मुझे स्कूल मत भेजो , नहीं तो मैं पैन्ट खोल दूंगा, पर माँ का दो टूक जबाब था ,तब भी तुम्हें स्कूल तो जाना ही पड़ेगा , शर्म आवेगी तो तुमको.
यह मेरे जीवन का एक ऐसा अनुभव है जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया.
सच है , हमारा शरीर , हमारी बुद्धि विद्रोह करती है क्यों कि शरीर औेर बुद्धि की स्वतन्त्रता का अपहरण होता प्रतीत होता है .
शरीर औेर बुद्धि तो परम् स्वतन्त्र रहना चाहते हैं ,जब कभी इन्हें किसी विशीष्ट मार्ग पर चलाने का य् किसी विशेष साँचें में ढालने का प्रयास होता है, और इन पर नियंत्रण लगाया जाना अभीष्ट होता है शरीर तो शरीर , सारी मन -बुद्धि, ये सभि मिल कर एक साथ उस नियंत्रण का विरोध करते हैं .
यह बात मैं अधिक शिद्दत से महसूस करत् हूँ.
बाद के जीवन में मैंने अपने आप को बहुत से बन्धनों में बाँधा. बहुत से बंधन पूर्णतः स्वैच्छिक थे. आप चाहे तो उसको संयम का नाम दे सकते हैं. कुछ बन्धन परिस्थितिजन्य भी थे. कुछ बन्धन आरोपित भी थे.अनैच्छिक दूसरौं द्वारा लादे गये थे.
पर मैंने पाया कि जब भि अपने आप को बाँधने का ,निर्देशित करने का , संयमित करने का प्रयास भी किया तो कम से कम एक बार तो किसी शक्ति ने उसका विरोध किया ही - कभी वह शक्ति आन्तरिक तो कभी वह वाह्य होती है कभी वह सुक्ष्म, कभी तीब्र , कभी स्पष्ट , कई बार अस्पष्ट ,कभी प्रत्यक्ष, कभी परोक्ष.
चूँकि माँ ने बचपन में ही बता डाला था कि यह सब बन्धन से बचने का बहाना मात्र है , एक बार इस बहाने को मुँह लगाया नहीं कि यह परिक जायेगा, बार बार आने वाला अप्रिय अनचाहा मेहमान बन जायेगा.
यह स्वाभाविक विरोध नहीं है, बन्धन से बचने का प्रयास भर है.
ब
ँ
मुझे याद पड़ता है, माँ को राह चलते लोग सलाह देते थे कि इस तरह स्कूल जबरदस्ती क्यूँ भेजती हैं.
माँ का उत्तर होता था- यह स्कूल नहीं जाने के लिये ही तो यह सब नाटक ड्रामा कर रहा है, यदि इसे पता चल गया कि इस तरह उछल कूद करने से यह स्कूल जाने से बच जायेगा तब तो यह रोज यही ड्रामा करेगा. तब तो यही इसकी आदत ही बन जायेगी . वह आगे कहती , पर यदि इसे दो चार बार समझ में आ जायेगा कि किसी भी किमत पर इसे स्कूल जाना ही पड्देगा और यह ड्रामा काम नहीं ही आयेगा, तो यह खुद ब खुद आपने को बदल लेगा.
मुझे यह दृश्य आज भी याद है - हू बहू - कलकत्ता के मछुआ बाजार- रविन्द्र सरणी, फूल-कटरा- मारवाड़ी रिलिफ सौसाईटी, बौल की आस्पताल जहाँ शायद मेरा जन्म हुआ था और डीडू माहेश्वरी स्कूल .
बड़े होने के बाद मेरी माँ के मुँह से यह प्रकरण सैंकड़ो बार सुन चुका हूँ.
माँ इस दृश्य को मेरी पत्नी , बच्चों , मेरे जूनीयर , मेरे सिनीयर सभी को कई बार बता चूकी है . सेवा काल में भी माँ ने यह प्ररण बार बार मेरे छोटे -बड़े सभि को कई बार बताया.
अरे हा़ , याद आया , एक बार मैंने सकूल जाते वक्त माँ को धमकी दी कि मुझे स्कूल मत भेजो , नहीं तो मैं पैन्ट खोल दूंगा, पर माँ का दो टूक जबाब था ,तब भी तुम्हें स्कूल तो जाना ही पड़ेगा , शर्म आवेगी तो तुमको.
यह मेरे जीवन का एक ऐसा अनुभव है जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया.
सच है , हमारा शरीर , हमारी बुद्धि विद्रोह करती है क्यों कि शरीर औेर बुद्धि की स्वतन्त्रता का अपहरण होता प्रतीत होता है .
शरीर औेर बुद्धि तो परम् स्वतन्त्र रहना चाहते हैं ,जब कभी इन्हें किसी विशीष्ट मार्ग पर चलाने का य् किसी विशेष साँचें में ढालने का प्रयास होता है, और इन पर नियंत्रण लगाया जाना अभीष्ट होता है शरीर तो शरीर , सारी मन -बुद्धि, ये सभि मिल कर एक साथ उस नियंत्रण का विरोध करते हैं .
यह बात मैं अधिक शिद्दत से महसूस करत् हूँ.
बाद के जीवन में मैंने अपने आप को बहुत से बन्धनों में बाँधा. बहुत से बंधन पूर्णतः स्वैच्छिक थे. आप चाहे तो उसको संयम का नाम दे सकते हैं. कुछ बन्धन परिस्थितिजन्य भी थे. कुछ बन्धन आरोपित भी थे.अनैच्छिक दूसरौं द्वारा लादे गये थे.
पर मैंने पाया कि जब भि अपने आप को बाँधने का ,निर्देशित करने का , संयमित करने का प्रयास भी किया तो कम से कम एक बार तो किसी शक्ति ने उसका विरोध किया ही - कभी वह शक्ति आन्तरिक तो कभी वह वाह्य होती है कभी वह सुक्ष्म, कभी तीब्र , कभी स्पष्ट , कई बार अस्पष्ट ,कभी प्रत्यक्ष, कभी परोक्ष.
चूँकि माँ ने बचपन में ही बता डाला था कि यह सब बन्धन से बचने का बहाना मात्र है , एक बार इस बहाने को मुँह लगाया नहीं कि यह परिक जायेगा, बार बार आने वाला अप्रिय अनचाहा मेहमान बन जायेगा.
यह स्वाभाविक विरोध नहीं है, बन्धन से बचने का प्रयास भर है.
ब
ँ
Saturday, 5 September 2015
_()_ ,
The youngest teaches me the most
that too the newest , , the extra-fresh , the lesson of hope ,
Let me leave like a true learner.
With regards to all those who allowed me to learn through them ...
See MoreThe youngest teaches me the most
that too the newest , , the extra-fresh , the lesson of hope ,
Let me leave like a true learner.
With regards to all those who allowed me to learn through them ...
चिन्तित विचारों को , मनन कर लिये गये साक्ष्यों को कल्पित धारणाओं को,परिश्रम की मंजूषा में सुरक्षित रखने से ही यश, श्रेय , वैभव ,प्रेरण् ,एवं शान्ति मिलती है .
परिश्रम की मंजूषा में यदि विचारों को सुरक्षित-संरक्षित- परिचारित नहीं किया गया तो वे कितने ही सुन्दर क्यों न हो , कितने ही अनमोल क्यौं न हौ , लुप्त हो जाते हैं
सुचिन्तित -सुविचारित परिश्रम ही परम साधन है और अन्तिम साध्य है
परिश्रम की मंजूषा में यदि विचारों को सुरक्षित-संरक्षित- परिचारित नहीं किया गया तो वे कितने ही सुन्दर क्यों न हो , कितने ही अनमोल क्यौं न हौ , लुप्त हो जाते हैं
सुचिन्तित -सुविचारित परिश्रम ही परम साधन है और अन्तिम साध्य है
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