Friday, 3 April 2015

अर्जन क्यों ? मैं क्यों कमाऊं ?
यह प्रश्न एक २५ वर्षीय बाला ने इस प्रकार पूछा कि आप क्यों कमाते है ?
जीव अपनी तृष्णा के वशीभूत अर्जन करता  है.
व्यक्ति  विस्तार के लिये ही जीवन धारण करता है ,दैहिक विस्तार ,मानसिक विस्तार ,संस्कारिक विस्तार ,आध्यात्मिक विस्तार ,वैचारिक विस्तार ,भौतिक विस्तार ,अधिभौतिक विस्तार .
इसी विस्तार के समानांतर परिष्कार की भी भावना रहती  है . परिष्कार के लिये ही ब्यक्ति समूह -साधन करता है .
समागम -सहजीवन यही सोद्देश्य विस्तार -प्रयोजन परिष्कार करते हैं .
कितना कुछ कह गया वह एक आँख का एक पनियाया कोना और दूसरी आँख के कोने से बरसती आग
पनीयाई आँख में उतर आया था पानी और खून ,दूसरी आँख के कोने में चढ़ा जा रहा वही पानी और खून
एक की तासीरसे  सपने, हौसले ठन्डे हुए जा रहे थे  ,दुसरे से वही सब उफनते ,उबलते गुबरते जा रहे थे
कहना था सो तो यह कह ही गया ,अनकही ,अनसुनी भी बहुत कुछ यह सुन-सुना ,देख दिखा  ही गया 
स्पर्श और मौन ,बस यही तो सब कुछ है .स्पर्श हटा ,या मौन हुआ ,स्पर्श हुआ और मौन हटा ,इतने में ही तो सब कुछ है , हो जाता है , होते होते रह जाता है . स्पर्श हो  या है या  नहीं - , बस इतने से ही सब फर्क पड़ता रहता है . सम्पूर्ण जीवन इसी स्पर्श अथवा मौन के अलग अलग आयाम लिये है .
स्पर्श करना या न करना ही तो सीखना है,कितना ,कब कहाँ कैसे ,क्यों करना है  या नहीं करना है -बस इसी में तो सारी  .सफलता-असफलता बसी है -जीवन की सारी उर्जा के सारे आयाम -उनकी गति , मात्रा ,दिशा और त्वरिता बसी हुई है .
और यही हाल मौन होने या न होने से भी बस इसी प्रकार जुड़ा हुआ है 

Thursday, 2 April 2015

Yes, I am there
टूटने का या जुटने का एहसास ,कंपकंपी ला ही देता है 
बहुत कुछ था जो पीछे छूटता जाता है
बहुत कुछ है  जो आगे जूटता जाता है
बहुत कुछ था ढका जो ,फूटता जाता है
कमाया ,जुटाया बचाया ,लूटता जाता है।