Wednesday, 4 February 2015

वैसे मैं केवल संकल्प ही कर सकता हूँ .दावा नहीं .सदैव भय बना रहता है . संतों ने कहा है "आरत के नहीं दोष गुशाईं ". बुभुक्षितम किम न करोति पापम . सच है ,विवशता को प्रणाम .विवशता की स्थिति में वस्तुतः धार्मिक ,नैतिक  आदि मूल्यों का क्या होगा , अंतिम रूप से कोई भविष्य वाणी  नहीं की जा सकती . विवशता का दबाव प्रचंड होता है .
मनुष्य की धारणा और परमात्मा के निश्चय में अंतर हो सकता है .
यह अलग बात है की क्रम प्रधान विश्व करी राखा  के सिद्धान्त की छाया में कर्मयोगी , फकीर , भक्तियोगी , विधि के विधान से भी लोहा लेते हैं .
पर जिन लोगों ने विशेष कर्म कर सफलता पाई है क्या उनके पीछे भी विधि की प्रेरणा नहीं रही होगी .
इस श्रृष्टि में अनंत बीज बिना किसी वृक्ष को जन्म दिए नष्ट हो जाते है , कुछ तो अकुर तक नहीं पाते कुछ पशुओं के , कुछ पक्षियों के , कुछ अन्य जीवों के , कुछ मनुष्यों के भोजन बन जाते हैं अथवा अन्य उपयोग में आ जाते हैं या ले आये जाते हैं और उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है .
क्या उन बीजों में वृक्ष बनने ,बनाने की लालसा  नहीं रही होगी . उन्हें क्या वृक्ष बनना अच्छा नहीं लगता .
अनंत इच्छाएँ बिना किसी धारणा के ही प्रतिदिन मरती हैं .अनन्त धारणाएँ भी प्रतिदिन अकारण ही  शांत हो जाती हैं .अनंत प्रयास असफल होते रहते हैं .क्या सभी असफल प्रयासों के पीछे कोई कारण रहा होगा .
फिर अनंत प्रयास सफल भी होते रहे हैं .क्या सभी के पीछे विशिष्ट पुरुषार्थ ही रहा होगा .
 न तो मैं जनता हूँ , न जानना चाहता हूँ .
सफलता ही केवल सफलता है . सफलता ही इष्ट है
सफलता ही सत्य है .
सफलता ही ब्रह्म है .
असफलता ही असत्य है . विजय ही सत्य और सफलता का प्रमाण है .
विजय ही सफल और योग्यता का प्रमाण है .
निर्ल्लज्ज भाव से सहायता के लिये बुलाना ,पुकारना ही वह बिन्दु है जहाँ ईश्वरीय सहायता नीचे धरती पर आती है ,हमारे पास पहुंचती है .कातर भाव , दीन भाव ही कृपा प्राप्ति का आधार है . बेवजह अभिमान प्रगति ,प्रश्रय ,परिश्रम ,प्रेरणा , प्रेम  को रोकता है , मार्ग अवरुद्ध करता है .
सबसे कठिन है, सम्मान कमाना।
 यह दुर्लभ भी है , दुर्गम भी।  यह भँगुर भी है।
सम्मान की रक्षा भी अत्यंत कठिन क्रिया है।
 सम्मान के चारों ओ र इर्ष्या रूप भेदी  नाचते रहते है।
आपका सम्मान दूसरों की आँखों में खटकता रहता है।
 अपनों को यह  अधिक असह्य हो जाता है।
 अपनों से सम्मान पाना अधिक दुष्कर है।
सम्मान दायित्व पैदा करता है।
सम्मान का निर्वहन उसके प्राप्त करने से भी अधिक भारी  ,दुरूह है . 
पेट पलना इतना भी सरल नहीं होता .जिनको मा-बाप का सहारा मिलता है वह तो जब तक सहारा रहता है तब तक तो जी लेते है .
बेसहारों को जीने के लिये सौ सौ पापड़ बेलने पड़ते हैं .बड़ी जिल्लत झेलनी पडती है .पेट के खातिर बड़ा शर्मिंदा होना पड़ता है .मांगने पर मौत कोई देता नहीं -पेटमे लगती  रहती हैआग हर दो चार घंटे पर -असह्य आग और उस आग के संन्य तो मौत ही एक रास्ता होता है या किसी भी तरह पेट कि आग का निवारण .खाना  खुद कमाना सिखने तक बड़ा कष्ट होता है . फिर खाना  कमाने के लिये जिसके पास खिलाने के लिये अतिरिक्त होता है ,या जहाँ खाना  पड़ा या रखा होता है उसके नखरे .पेट की आग के सामने सारी नैतिकता आत्म सम्मान का प्रश्न गौण हो जाता है . बस किसी तरह पेट की आग शांत हो - फिर देखा जायेगा .
कुटिल लोगों ने भूख के इस चरित्र को जाना और समझा .
पहले कुछ ऐसा करते हैं की आप को भूख से बिलबिला देते हैं ., फिर आपको अपनी शर्तों पर नाचने के लिये मजबूर करते हैं ,आपका उचित - अनुचित ,नैतिक -अनैतिक ,स्वस्थ-अस्वस्थ ,लाभकारी -हानिकारक शोषण करते हैं और आप भूख की वेदना के वसीभूत जानते हुए भी उनका प्रतिकार करने में असफल होते हैं ,आपके पास आत्म समर्पण के आलावा कोई विकल्प ही नहीं रहता.
पर हाँ ,भूख की इस वेदना को वही समझ सकता है जो खूद भूखा रहा हो - भूख धीरे धीरे मनुष्य कोअपनी ही नजरों से गिराने लगती है ,लचर बना देती है --- भगवन ,कभी किसी को भूख का  दंड मत देना -- भूख सारे पापों की जननी है .

Tuesday, 3 February 2015

गलियों का स्वाद कितना कसैला होता है , यह मुझे पता है ,भूख आँत कैसे जलाती है यह भी पता है ,
क्लक्त्त्ते के बड़ाबाजार से भूखे ही कांकुरगाछी  पैदल चले जाना -चलते जाना , बस भाड़ा १० पैसा बचाना कैसा लगता है मुझ्र पता है .  अपनी  माँ का ,अपने पिता का अपमान खुद ही देखना कैसा लगता है ,मुझे पता है . बिना  गेट बंद किये एक लैट्रिन में निवृत होना कैसी श्रम पैदा करता है मुझे पता है .सुबह चार बजे पिता-पुत्र अलमुनियम पे पुराने बर्तनों को क्यों और कैसे दस किलो के लोहे के हथौड़े से पीटते थे ,मुझे मालूम है . पीठ पर रस्सियों के जल में अलमुनियम के बर्तन ढोना याद है , बस पर पीछे की और से सीधी पर चढ़ते हुए सर के बल बोझ चढ़ाना या उतरना कैसा लगता है मुझे याद है . शेरे पंजाब होटल में सरदार जी किन शर्तों पर कभी कभी सिंघारा खिलाया करता था याद है . बरसात में भींगते हुए पटना स्टेसन पर अख़बार बेचना याद है . एक दिन नहीं बिक पाया तो बुक्का फाड़ कर रोना याद है .जली हुई खिचड़ी खाना  ,रिश्तेदार को खिलाना याद है .
एक एक पुरानी किताबों के लिये क्या क्या किया , सब याद है .कुर्सी पर बैठ जाने पर किया गया अपमान याद है . बैंक के हेड कैशियर से बात कर लेने पर खाई जूते की मार याद है .गुनी गोसाई ने मर खनने से बचाया याद है .
बैंक के मेनेजर के अनुरोध पर दस हजार के गारंटी पेपर पर भी किसी का हस्ताक्षर न करना और उसके बाद की निराशा याद है . उन्नीस साल की उम्र में सी इ आई आई बी की परीक्षा के प्रत्येक पार्ट के प्रत्येक पेपर में मेरे सहयोग से दिस्तिन्क्सं लाये बैंक कर्मियों का उत्साह याद है .सुबह चार बजे बैंक कर्मियों का पढ़ने के लिये आना ,प्रतीक्षा करना याद है 
ताजा गुंथे गये आंटे से ताज़ी सेकी गई गोल गोल फूली फूली रोटियों का स्वाद कैसा होता होगा .
ताजा दूध ,दही का स्वाद कैसा होगा ,गर्म सब्जियाँ,कढ़ी ,पकौड़ी ,कैसी होती होगी ,पता ही नहीं
हमने तो बस बासी रोटियों को धुप में सूखते ही देखा था , खट्टे होते आलूओं को सूखते देखा था
झूठन जब जहाँ भी दिखी हम दौड़ते गये,लडाई हमने कुत्तों कौवों संग लड़ते पुरखों को देखा था    

Monday, 2 February 2015

Every judicial order is judicial only because it describes the facts, mind , logic, reasoning and law behind what is being decided and then decides what has been or to be decided.
A right to know what has to be explained and to whom ,an opportunity of being heard and a right to know what has been decided and why, is the soul of justice . Absence of these can be any thing but justice for the condemned .