Monday, 2 February 2015

ऊपर उठो ,उठने की कोई सीमा नहीं होता , परिष्कार करो ,इसकी भी कोई सीमा नहीं होती -----
पर सावधान ,
गिरो मत , गिरना मत , गिरने की कोई सीमा नहीं होती -
एक बार भी गिरे तो गिरने से संकोच खत्म हो जायेगा - फिर गिरते ही चले जाओगे - मैं भी गिरने के लिये बोलूं , तो गिरना मत .
चलो ,बहुत हुआ ,अब खड़े हो कर आगे चलो ,उपर चढो , बढ़ो उपर और आगे .



अपनी सीमा से खुद को यत्न पूर्वक सहज सुरक्षित बाहर निकालो - घूमने फिरने के लिये ही नहीं ,विचारों को आजादी और नई दिशाएँ देने के लिये --- पहले के ,पुराने दृष्टिकोण से आगे चलने के लिये ---- नई विचार यात्रा पर कदम तो बढ़ाओ . आगे अभी और बहुत कुछ नया -अनजाना है

कोई सुने न सुने , पुकारने से तो किसी ने कभी मना किया नहीं ,खड़े हो कर इंतजार करने से भी कोई भला कैसे रोक सकता है , जब मैं किसी से मजदूरी मांगता नहीं तो सार्वजनिक स्थानों की सफाई करने से भी मुझे कोई क्यों रोकेगा ,कूड़ा यथास्थान उठा कर रख देने से भी कोई नहीं रोकेगा ,अँधेरी रात में रह में एक दीया जलाने की कब मनाही है , अपनी और से चिट्ठी भी लिखने से ,भेजने से भी कोई क्यों रोकेगा यदि उस पर उचित डाक टिकट लगाई गई हो और कोई अनुचित बात न लिखी जाये .जब जबाब मांगता ही नहीं तो भला मेरी चिट्ठी से आपको क्या फर्क ,आप - पढ़िये या न पढ़िये  -- इन सूनसान  आम रास्तों को मैं बुहारता रहता हूँ ,धोता रहता हूँ ,एक बर्तन में पीने का सुद्ध पानी लिये बैठता रहता हूँ ,रात के पहले एक दीया जलाया करता हूँ - भोर होने पर उसे दुसरे दिन के लिये उठा रखता हूँ - कोई मनाही तो है नहीं .
बस मेरा मन लगा रहता है . चित्त प्रसन्न रहता है . बस इतना ही .
मैं तो बस पढ़ने में लगा रहना चाहता हूँ - कोई मुझे न भी पढ़ाना चाहे तब भी .पढ़ने की इच्छा ,प्रतीक्षा ,प्रयास ,आश पर तो कोई रोक  है नहीं .
बस मेरा मन लगा रहता है .

Sunday, 1 February 2015

We must undertake a judicial resource - infrastructure comprehensive Inventory Exercise and Audit at national level ,a step which is over due
आज भी किसी सूट टाई धारी की पाकेट में पड़ा होगा मेरा वह सात वाक्यों का पत्र