Friday, 16 January 2015

यदि सब कुछ की आखिर एक  सीमा तो है ही न तब बेचते रहने की सीमा क्या है ?
बहुत कुछ बेचा - बिकवाया .कुछ तो बताओ जो बेचा -बिकवाया नहीं जा सकता .
सब कुछ खरीदने का अहंकार ही तुम्हे सब कुछ बेचने के अंधकार में धकेलने के लिये पर्याप्त है .
सभी कुछ का एक प्रेस टैग होता है और मैं खरीददार हूँ , दाम बताओ,यह भ्रम ही इस वास्तविकता का आधार है की तुम अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ बिकने को तैयार हो -केवल तुम्हे दाम देने वाले की प्रतीक्षा है .
सच यह है की सारी दुनिया न तो बाजार है , न बना सकोगे , और दुनिया में सदैव कुछ ऐसा रहेगा जिसे खरीदा बेचा नहीं जा सकता. बहुत से ऐसे हैं जो कभी भी नहीं बिकेंगें . प्रश्न ही नहीं है .

Thursday, 15 January 2015

Every living being is continuous source of physical movement, inertia (if it is really some where ) {I doubt any assumed inertia} ; energy cycle and the entire cosmos inter-relative friction-sound energy illumination equation.
History as we read and endorse is only inferences drawn by various persons interested in that field,know not why. Inferences may be mixed with innocent subjectivity or may be product of highly interestedness, may also be product of prompting,misrepresentation ,undue influence ,ulterior motive , otherwise other consideration.
History is after all narrations as per one's perception and analysis.
One's own views and culture has always a role to play


समाज अच्छा होने की ,अच्छा रहने की , अच्छा ही मर जाने की बहुत बड़ी कीमत मांगता है .
अच्छाई और यह कीमत एक साथ चलती है .
जो अच्छे तो होना ,रहना ,या मरना चाहते हैं पर समाज को उसकी कीमत अदा नहीं करना चाहते , या नहीं कर पाते उन्हें समाज अच्छा न तो कहता है , न सहता है - समाज उनके साथ नहीं रहता.
है तो विडम्बना ,पर है कुछ ऐसा ही .
मानिये ,समझिये तो भी ठीक - न मानिए ,न समझिये तो भी; है तो यही .
वैसे समझ में नहीं आया आज तक - अच्छाई के साथ समाज का ऐसा ब्यवहार क्यों ?
शायद समाज का यही रिवाज है , परखने का ,पहचानने का !
उदास मत हो मेरे यार 
कभी बिंदु उडाता मजाक रेखा का
कभी वक्र-रेखा हंसे सरल रेखा को 
वृत्त कनखियाता वक्र रेखा को 
श्रुति हंसती स्मृति पर 
स्मृति कसे फब्तियां संहिता पर
छंद-दारों ने केंचुआ छंद कहा
छंद-बंध जब तोडा फोड़ा तो
अकवि तक कहा , सब सहा
आज फेसबुकिया कहते हैं व ही
उदास मत हो मेरे यार
इ-साहित्य की होगी दुनिया
और आप होंगे इ-साहित्यिक
और होंगे वेबिनार
वेब पर होंगे वेब्मिलन
फेसबुकिया पहुंचेगा करोड़ों तक
उदास मत हो मेरे इ- यार
इ साहित्य रहने आया है
चिट्ठियों को इ-मेल ने चलता किया
इ-ट्रेड ने सेट किया नया ट्रेंड
आप भी करेंगें नई यात्रा
उदास मत हो मेरे फेसबुकिया यार
कविता कर
आने वाला कल आयेगा ही
उदास मत हो मेरे यार 
कभी बिंदु उडाता मजाक रेखा का
कभी वक्र-रेखा हंसे सरल रेखा को 
वृत्त कनखियाता वक्र रेखा को 
श्रुति हंसती स्मृति पर 
स्मृति कसे फब्तियां संहिता पर
छंद-दारों ने केंचुआ छंद कहा
छंद-बंध जब तोडा फोड़ा तो
अकवि तक कहा , सब सहा
आज फेसबुकिया कहते हैं वही
उदास मत हो मेरे यार। 


इ-साहित्य की होगी दुनिया
और आप होंगे इ-साहित्यिक
और होंगे वेबिनार
वेब पर होंगे वेब्मिलन
फेसबुकिया पहुंचेगा करोड़ों तक
उदास मत हो मेरे इ- यार
इ साहित्य रहने आया है
चिट्ठियों को इ-मेल ने चलता किया
इ-ट्रेड ने सेट किया नया ट्रेंड
आप भी करेंगें नई यात्रा
उदास मत हो मेरे फेसबुकिया यार
कविता कर
आने वाला कल आयेगा ही
जीवन में एक दोस्त कर्ण जैसा भी जरूर होना चाहिए,
जो तुम्हारे गलत होते हुए भी तुम्हारे लिए युद्ध करे.!!