Wednesday, 3 September 2014

मर्यादा और दायित्व की रक्षा करो , यदि यह सामाजिक व्यवस्था बन जाती है तो प्रत्येक अधिकार की रक्षा स्वयं हो जाएगी . 
मर्यादा और दायित्व क बोध बालपन से ही सभी को करवाया जाये और इसे ही प्रवर्तित किया जाये तो अधिकार सभी के स्वतः सुरक्षित हो जायेंगें
समर्थन के लिए बुद्धि-विवेक की बहुत ज़रूरत नहीं, विरोध के लिए थोड़े अक़्ल की भी आवश्यकता होती है। गालियां वे लोग देते हैं जिनके पास न शब्द हैं, न विचार और न दृष्टि।
असहमत होना कोई बड़ी बात नहीं ,असहमति व्यक्त करना एक दायित्व है ,बोध है , कला है , नियम है , कर्तव्य है -अधिकार तो है ही
आप या मैं ,जो भी काम करेंगें ,उसमे कुछ बाधाएँ तो आयेगी ही . बाधाएँ आप के रवैये के अनुसार अपना प्रभाव ,स्वरूप दिखाती है . बाधाएँ आपके कौशल की परीक्षा भर है ,उनमे पास करने का हौसला , पराक्रम तथा निर्णय आपको ही करना है . अधिकांश बाधाएँ थोड़े से धैर्य, परिश्रम ,संयम तथा विवेक से पार की जा सकती है . ह्मारे आपके पहले भी यही सारी परेशानियाँ आती रही है और लोग इनका सामना कर सफल होते रहे हैं .जितनी बड़ी सफलता का सपना होगा ,हो सकता है ,परेशानियाँ उतनी ही बड़ी आवे पर उन्हें सफलता पूर्वक निपटाया जा सकता है . सफल होना आपके हाथ हैं

Tuesday, 2 September 2014

विगत ५८ वर्षों के अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूँ की प्रत्येक ताप ,कष्ट ,पीड़ा  मन की अशुद्धियाँ दूर करती है .
मैं कह सकता हूँ की स्वर्ण पर अग्नि का कितना ऋण हैं .
निंदा पीड़ा तो देती है पर उसका अंतिम फल सदैव लाभ देता है .

Monday, 1 September 2014

लोलुप भक्षकों के गिरोह घूमते हैं
भेड़ की खाल ओढ़े भेड़िये घूमते  हैं .

इज्जत बचा ले जाओ बस अपनी
ईर्ष्या का ले खंजर ,पैर चूमते  है .

तुम्हें तुम्हारी ही नजर से गिरा देंगें
तुम्हारे यश ही उन्हें अधिक चुभते है

गिडगिडाती सुखी आंसू की धार
तुम्हारा नंगा देह इन्हें सुहाते  है

कहानियाँ गढ़ रखी है इन्होंने
इन्हीं से ये गंदा जाल फैलाते  है
पुस्तकों ने आपको कितना ललचाया है ?
कितना उत्तेजित किया है ?
क्या कभी किसी पुस्तक का खयाल आया है
क्या इतना की नींद उड़ गयी हो
क्या पुस्तकों ने आपको वहाँ पहुंचाया है ?
क्या आपने पुस्तक पढ़ी ही है ?
लिखी कभी नहीं !
काश ! कोई पुस्तक आपको चैन दे पाती ,
आप कुछ तो पढ़ पाते
कुछ लिख जाते .
पुस्तक के साथ रहे तो होते !