Wednesday, 8 January 2014

meri ankahi kahani meri jubani-shyad kuchh bhi na chhupaya

कालेज प्रांगण में  आने जाने के क्रम में यह बात पता चल ही गयी कि कालेज में नाम  विद्यार्थियों में कुछ केवल इस लिए कालेज में दखिला लेते थे कि उससे उनकी शादी के वक्त दहेज कुछ अधिक मिलेगा। कालेज आने वाले  अधिकांश  युवक  अपने को मिलने वाले दहेज के बारे में बड़े गर्व से  अहवा उसके प्रस्ताव के बारे में चटकारे ले कर चर्चा करते थे। 
कुछ एक विद्यार्थी कालेज में प्रवेश करने  के  बाद  मिहनत करना   शुरू कर देते थे। मैंने ऐसे कुछ एक विद्यार्थियों  को बहुत करीब से देखा। इस वक्त इन विद्यर्थियों की वास्तविक उम्र २२-२३-२४  साल हो चुकी होती थी।  मुझे आश्चर्य होता था कि मेरी उम्र  १७ की। बाद में पता चला कि  कागज और सर्टिफिकेट में तो उनकी भी उम्र १६-१७ ही है। असल में असली उम्र और कागजी उम्र का यह गोरख धंधा सारी हिंदी पटटी में प्रचलित है। 
एक समय मेरे परिवार में पाँच सदस्य हुआ करते थे। मैं मेरे पिता अस्वस्थ। कालांतर में मेरी बहन   भी अस्वस्थ हुई तथा अंततः १९८५ में चल बसी। बहन  की बीमारी की  कहानी फिर कभी !
पिताजी का मनोबल टूट चूका ,शायद निराश रहा करते थे। आर्थिक साधन भी टूट चुके थे। 
खैर किसी प्रकार टूटते -घिसटते पीटते ,लड़ते ,लड़ाते हमलोगों का एडमिशन हुआ। 
मुझे याद हे जब प्रो गुप्ता जी के निर्देश पर मैं कालेज में फार्म आदि भरने गया था तो मुझे देख कर ही कालेज के कर्मचारियों की अजीब सी प्रतिक्रिया हुई।  एड्मिशन फार्म पर अंग्रेजी में हस्ताक्षर किए तो सामने उपस्थित क्लर्क महोदय ने मुझसे पूछा क्या   हिंदी नहीं  जानते हो। 
कालेज में कोई खास पढ़ने की चीज नहीं थी। शिक्षक,कर्मचारी ,विद्यार्थी सभी एक  सीरे से खैनी  अभयस्त थे। ऐसा लगता था कि खैनी खाना ,खिलाना वहाँ का प्रचलित व्यवहार था.कोई भी उसके बारे में सोचने तक के लिए तैयार नहीं थे। कभी-कभार मैं खैनी के लिए अपनी अरुचि को अपने मनोभावों से  प्रकट कर  देने पर  मुझे सारे वातावरण से अलग खड़े  पड़ता था।   इसके लिए मुझे   विवश किया था। 
एक अजीब सी बात थी वहाँ ,कॉलेजके  शिक्षकों की रूचि पढने में -पढ़ाने में कम  जातीय गुटबाजी या राजनीति में  अधिक थी। काले के अधिकांश शिक्षक विषय के  गम्भीर जानकार नहीं थे। विषय का सतही ज्ञान रखते थे। कूछ एक  शिक्षक विषय के अच्छे जानकार  तो थे पर कालेज प्रशासन अथवा विद्यर्थियों द्वारा आवश्यक अथवा समुचित सहयोग नहीं मिलने के कारण  क्लासों में भारी मन से आते थे। 
विद्यार्थियों का स्वरुप क्या बताऊ ? अधिकांश विद्यार्थी  गांव से आते थे।  सीमान्त किसान के बेटे।।कुछ   तो कृषि -मजदूर  के बेटे।कुछ वस्तुतः  दैनिक मजदूर।  अनुसूचित जाति के मजदूर विद्यार्थी। सफाई  वाला विद्यार्थी। सायकिल के पंक्चर बनाने वाला  विद्यार्थी। समाज के निचे   पायदान वाला विद्यार्थी।  पर पढ़ाई का वातावरण नदारद।   
  

Tuesday, 7 January 2014

निवृत्ति और प्रवृत्ति दोनों ही एक ही मार्ग के दो छोर है। इन्हें मैं अलग अलग नहीं जन प् रहा हुँ। एक की यात्रा स्वतः दूसरे तक की यात्रा है।
सन ७३ में किसी प्रकार अनेक विरोधों के बीच अत्यंत स्वल्प साधनों को येन केन प्रकारेण एकत्र कर  मेरा कालेज में दाखिला करवाया गया।
सच कहुँ  तो कालेज में पढ़ने लायक जैसा कुछ भी नहीं था। लगता है ,मेरे पास साधन,समय,शक्ति भी  नहीं थी। ननिहाली कपडे की दुकान में कपड़ा बेचा करता था। शेष बचे समय में क्षुद्र ट्यूशन टाइप की चीज करता था। कभी कभार इस सिलसिले में पटना आना जाना पड़ता था। कपडे की दुकान की खरीदारी के सिलसिले में। आने जाने के नाम पर गिनती के पैसे मिलते थे। कुछ नया युवा मन था। कभी कभार कुछ पत्रिकाएं खरीदने का मन होता था , साधन थे नहीं ,ऐसे में साढ़े तीन रुपयेसे कुछ अधिक में पचास अख़बार लेकर अँधेरा रहते अथवा पौ फटते तक बेच लेना एक स्वावलम्बी साधन प्रतीत होता था। यह काम मैंने दस पांच बार तो अवश्य किया होगा।
इस दौरान भयंकर संघर्ष थे। मेरे दादा कलकत्ता से ७३-७४ में विशाखापत्तनम चले गए थे। मेरे सबसे  छोटे
चाचा को लेकर।
दादाजी १९७६ के आसपास स्वर्गवासी हूए ,इसी वक्त मेने छुपते छुपाते कुछ किताबें खरीदी। पढ़ी  और इसी दौरान रांची विश्व् विद्यालय कि विभिन्न कालेजो में पढ़ रहे कुछ विद्यर्थियो से मित्रवत स्नेह पाया। इस दौरान अर्थशास्त्र  मेरा प्रिया विषय था।
जूनून की तरह उस बीस वर्ष की उम्र में मैं लगा रहता था। उसी क्रम में मैं कुछ इकोनोमिक्स के जानकारों के संपर्क में आया। उसी खोज के क्रम में रांची भी गया। शायद किसी दुकानदार का छोटा मोटा चिट्ठी -पत्री का कम या कोई सरकारी कागज पढ़ देने पर ,ययस्क जबाब लिख देने पर शायद कुछ पैसे मिल जयकरते थे।  घर के अपने साधन तो खाने तक के लिए पर्याप्त नहीं थे। पहनने के नाम पर रिश्तेदारों की उतरन। उसी खोज में छिपते छिपाते रांची, गया,दिल्ली , कलकत्ता,बनारस और इलाहबाद भी गया। स्टेट बैंक के कुछ कर्म चारी १९७४ से ही मेरे संपर्क में आ चुके थे। सम्भवतः उन्हें मेरे कामर्स के कलकतिया ज्ञान से आकर्षण था या उससे  मतलब सिद्ध होता होगा।

उनका मतलब

इसीबीच  
स्वयं को खोल डालना , सार्वजानिक कर डालना कोई सरल कम नहीं है। अमूमन व्यक्ति के पास सार्वजनिक करने लायक कुछ भी नहीं होता। व्यक्ति का जीवन कोई आर्ट गैलेरी तो है नहीं जिसे बड़ी तन्मयता से सोच समझ कर डिजाइन किया गया और फिर उसमें महँ कलाकारों की जीवन भर की साधना से उत्पन्न कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया हो।
मनुष्य कि यात्रा तोएक स्वतः स्फूर्त यात्रा है जिसमे छप्पन प्रकार के ब्यंजन भी हो सकते है और फाकाकशी भी। भयंकर ,वीभत्स रौद्र ,भयानक आदि रसों  के चेपक हो सकते है या  किवात्सल्य रस की पावन धारा ,श्रृंगार रस की उदात्त प्रस्तुति ,सम्पूर्ण शांत रस  या शांतिदायक भक्तिरस - कुछ भी हो सकता है।
जीवन इसी अनिश्चिंता कि अनबूझ पहेली है,अनंत यात्रा है।
 स्वयं को  सार्वजानिक कर डालने के बाद उसे पूनः नहीं बनाया जा सकता है। जो जीवन एक बार सर्वजनिक हुआ , वह फिर सदैव सार्वजानिक ही रह जाता   है।
पर दिक्कत तो यह है कि सार्वजनिक करने लायक कुछ रहता ही तो नहीं।
मेरी समझ में मनुष्य का जीवन संकीर्णताओं ,क्षुद्रताओं ,स्वार्थो ,आवेगो , सवेंगों ,भावनाओं के क्षणिक संघर्ष  का  अनंत क्रमबंधन है।
लगभग कुछ भी बताने या दिखाने  लायक तो है ही नहीं।
ऐसी स्थिति में स्वयं कोसार्वजनिक करते समय एक दोष भाव आ रहा है। मैं उससे बच नहीं पा  रहा हुँ।
केवल यही कहूंगा कि जितनी भी लघुता होगी वह सारी मुझमे भी होगी। यदि लघुता के विपरीत कुछ  है तो वह आप सभी का दिया हुआ ही होगा।
हो सकता है पूर्वजों के संस्कार हो या कि उन   संस्कारों की परावर्तित प्रतिछाया।
वैसे हजार बार यह मान लेने के बाद भी मै पाप पुंज हुँ ,मेरा ह्रदय यह मानने के लिए तैयार नहीं   हो पा  रहा हुँ
कि मै उस परमसत्ता से पूर्णतः विमुख होउंगा। जब वृक्ष,मृग ,गिद्ध ,बानर  विमुख नहीं हुए,तो मैं क्यों विमुख मानू।
इसी सम्बल के आधार पर मैं स्वयं को पूर्णतः सार्वजनिक करूँगा। शायद अपने पापो कि पोटली आप  सभी के सामने खोलते खोलते  उस प्रभु की कृपा का अंश मैं पुनः देख पाऊ। यदि नहीं देख पाऊ  तो कम से कम समझ ही पाऊ  और यदि मैं न देख पाऊ या न समझ पाऊ तो भी आप लोगों में से कोई तो उसे खोज ही   लेंगे।
पर यह प्रयास ,मेरी यह यात्रा , मेरा है। इसका सारा फलाफल मेरा। मेरे  अपराध मेरे ,अपराध बोध मेरा। आप में से कोई भी मेरे अपराध भाव को प्राप्त   न  करे।
  आप  सब उस अपराध  के न तो कारण है. न फल।
इसी प्रकार मेरे पुण्य भी आप सब से  पृथक है।





पूरी जिंदगी एक प्रवाह में जीना , एक लय में जी लेना ,एक तान में जीना ,एक सिरे से दूसरे सिरे तक की जिंदगी एक साथ जीना ,पूरी की पूरी जिंदगी जीना ,इसका मजा ही कुछ और है। टुकड़े - टुकड़े में जिंदगी जीना, टूट -टूट  कर जिंदगी जीना,वह मजा नहीं देती  है।
कई बार व्यक्ति को लगता है,अब टूट जाऊँगा , पर इच्छा शक्ति  से व्यक्ति टूटते टूटते रह जाता है।
कुछ यदि टूट ही जाते है तो पुराणी जिंदगी सिरे से ख़ारिज कर अपने में नया जीवन श्रोत उत्पन्न कर डालते हैं। नई जड़ें निकलते हैं। नई कोपल फूट पड़ती है।
पुराना जीवन सम्पूर्ण रूप से व्यर्थ हो चूका है। कुछ नहीं बचा। टूट चुके अंश को ढो कर अब क्या होगा।
लोग खामखा अपने आप को कबड़ीखाना बना डालते हैं।
मेरे ख्याल में अपने अंदर के कबाड़खाने को फेंकने की सबसे अच्छी कवायद  है , पुराने टूटे फूटे क्षणों  की ,यादों  की  खुली प्रदर्शनी लगा डालना। स्वयं कोअपने पुरे कबाड़ख़ाने के साथ लोगो के सामने खोल डालना।
कबाड़ख़ाने कि गुनसाइन  महक भी ख़त्म हो जायेगी ,देखने वाले उसी कबाड़ खाने से कुछ  अपने मतलब की चीजें ले जायेंगे ,आप हलके  हो जायेंगे।
कबाड़ख़ाने के भी ग्राहक होते है। कुछ को आपके रद्दी कबाड़ख़ाने मे ही अपने मतलब का कुछ मिल जायेगा। आप का कबाड़ साफ और उनका मसरफ पूरा हुआ। बन गई बात।
हाँ ,अपने कबाड़ख़ाने से मोह रखोगे तो दिक्कत है। कई बार हम और आप अपना कबाड़ , शेष स्मृतियाँ ,खट्टे मीठे अनुभव आम नहीं कर पाते। खुद से ही डर जाते हैं। मेरे अपने ही पाप मेरे ही सिर चढ़े रहते हैं। मैं उसे आपके और सबके सामने क्यों नहीं स्वीकार कर पाता।
पाप की स्वीकारोक्ति अत्यंत साहस की बात है।  पर दोष स्वीकार करने से प्रायश्चित का मार्ग प्रशस्त होता है। इस रस्ते से पापका भर कम हो जाता है।
पर, पाप  मैंने किया -इसे स्वीकार करना ही होगा।
अपने किये पाप को दिमाग के एक कोने में छिपा देना सरल तो है ,पर वह अंदर ही अंदर एक अजीब सी सिरहन पैदा कर डालता है। यह सिहरन व्यक्ति कि आतंरिक तथा वाह्य, दोनों ही कांति  ले उड़ती है।
सर्वोत्तम तो यह है कि पाप से बचो।
पर मनुष्य हो ,पाप-पुण्य ,गुण-दोष ,क्रिया-प्रतिक्रिया ,मनुष्य के साथ ही रहेगी। लाख प्रयत्न के बाद भी पापों से बचना सम्भव नहीं। हाँ , पापबोध से बचा जा सकता है।  पाप बोध से बचने का एक ही रास्ता है ,दांत पर दांत चढ़ा कर अपने पाप को स्वीकार कर डालो। उसे सार्वजनिक कर डालो। स्वयं शुद्धता आएगी , पाप के मल को साथ ले जायेगी।
अपने दिमाग में कबाड़ ,कूड़े -करकट  को प्रश्रय न दें। जब अवसर मिले तब अपने पाप को ,कूड़े -करकट को सार्वजनिक कर डालें। खुले विचारों की खुली हवा लगने दें।  पाप उपयोगी है। यह दुःख देता है। पाप से विपत्ति आती है। विपत्ति आने पर पाप  के कारणों- विपत्ति कारकों  की खोज होती है। तब उस परम शक्ति का स्मरण हो आता है।
इस परम शक्ति के सामने पाप और पापी जैसे ही उपस्थित होते है  पुनः व्यक्ति-जीव निर्मल हो जाता है।
पाप  के ताप तक प्रकाश को अंदर तक  जाने दॊ।
अपने अंदर के पाप-ताप  को जानो, स्वीकारो , फिर सार्वजनिक कर डालो। आपके पाप की स्वीकारोक्ति कहाँ -कहाँ निर्मलता लाएगी कोई नहीं जनता।
फिर कुछ पेशेवर कबाड़ी हैं   घर घर घूम घूम कर कबाड़ ख़रीदा करते हैं।
ऐसे संतों के सामने अपना कबाड़ रख भर दो ,देखो कैसी सहजता के साथ आपके कबाड़ को जगह लगा देते हैं। ठिकाने लगा देते हैं।
केवल अपने कबाड़ को सार्वजनिक करने का साहस पैदा करो ,सार्वजानिक कर डालो ,यह सम्भव है।


  
आपने शहद तो देखा होगा। मधुमक्खियों के छत्ते भी देखे ही होंगे। मधुमक्खियों को आते जाते भी देखा ही होगा। पर क्या किसी मधुमक्खी को फूल से उड़ते समय शहद ले कर जाते देखा है। मधुमक्खियाँ फूल के जीवन का अभिन्न अंग है। प्रकृति में सब कुछ परस्पर सम्बन्धित  है। मधुमक्खियों का सतत परिश्रम ही शहद बनने  की शर्त है।
लगभग यही स्थिति धन के सृजन के लिए भी है।
यह  शोषण और शोषक की कहानी से और उसी थियरी  मे उलझने से काम नहीं  चलेगा।
लगातार जिम्मेवारी और खतरा उठा कर काम  करना होगा,परिश्रम करना होगा। ऐसा नहीं हो सकता की सफलता के मीठे फल आप खाइये  और असफलता की कडुआहट दूसरों के लिए छोड़ दें। यदि आपने ऐसा करने की कोशिश की तो आप श्री ,समृद्धि ,संपत्ति ,धन ,साधन सेवंचित रह जायेंगे।
खतरे उठाना  सीखिए ,जिम्मेवारी लेना सीखिए। असफलता को  बर्दाश्त करना सीखिए। केवल शाहद के छत्ते को देख कर मधुमक्खियों को चोर कह देने से कम नहीं चलेगा।
आप मधु का  छाता  जला कर ,मधुमक्खियों को भगा कर, छाता  तोड़ कर पाव ,सेर, पसेरी शहद एक बार ले जा सकते हैं।
इससे अच्छा है,हम आप और सभी मधुमक्खी वृत्ति अपना लें।
फूलों  का भी भला ,आप का भी भला ,समाज का भी भला। धन से मन ही मन प्रेम करना और धनी को गाली देना,यह कहाँ का न्याय है।
वैसे धन आज के सन्दर्भ में उतने पवित्र ढंग से नहीं एकत्र किया जाता जितने पवित्र ढंग से मधुमक्खियाँ  शहद एकत्र करती है।
अनेक धन पशु है ,जिन्होंने सारे  अनुचित माध्यमों से धन बना  डाला है।
उनसे आपका और मेरा विरोध होना ही चाहिए।
पाप का धन मेरा हो या आपका ,वह है तो आखिर पाप का। पापी मन मेरा हो या आपका वह है तो पापी ही।
पाप पाप ही है।  ऐसा नहीं हो सकता  कि दूसरे का पाप पाप और मेरा पाप माफ़ , "सब चलता है , क्या करे मजबूरी है ".
अपने पाप को मजबूरी की चादर में मत लपेटिये। अपने पाप को  अनजाने  में हुआ पाप कह  कर बचने की  चेष्टा मत कीजिये। पाप ,पाप ही है।
गुरु नानकदेव जी ने जिस खून वाली रोटी को दिखलाया था ,वह जब भी ,जहाँ  भी मिले ,उसे कुत्ते तक को मत खाने दें। ऐसी रोटी को हाथ तक न लगाये। यह सर्वनाश कर  देगी।
ऐसी खुनी रोटी से भूखा सोना भला ,दरिद्रता भली। भूखा पेट भला।
सही है , मैं जनता हू ,भूख में बड़ी ज्वाला होती है।
पर भूख पाप का औचित्य सिद्ध नहीं कर सकती।
चाहे जो भी हो ,लोभ को मैं  सबसे बड़ा पाप समझता हुँ। भूख कि ज्वाला भी मुझे लोभ मार्ग पर प्रवृत नहीं कर सकती।
वैसे मैं  संकल्प कर सकता हुँ ,दावा नहीं। सदैव भय बना रहता है।
वैसे विवशता को प्रणाम ही करना उचित होगा।




फूलों 

Monday, 6 January 2014

बिना भय के प्रेम ही श्रद्धा है।
छोटे या बड़े ,सभी के प्रति आदर के साथ प्रेम  , श्रद्धा है।