Wednesday, 8 May 2013

सूखा ,उतरा सा वह क्यों
अभी-अभी क्या बह गया है
पानी आँख का
या आँसू आँख से
या सिर के उपर से पानी,
कहीं पानी उतर तो नहीं गया है।

कहते क्यों नहीं,
अभी -अभी वह क्या कह गया है
चुप रहने के लिये
... या छिप जाने के लिये
या कुछ छिपा देने के लिये
कही सब कुछ उजागर तो नहीं हो गया है।

वह उदास क्यों था,
वह क्या सह गया है
उपहास या अपमान
सत्यानाश या सर्वनाश
य़ा कि बाकी कुछ ही रह गया है
कहीं कुछ खो तो नहीं गया है।

बताते क्यौ नहीं
पूछ तो रहा हूँ, अब क्या रह गया है
मलाल,अफसोस,पछतावा
या कि केवल याद
हो सकता है, हो कोइ स्वाद
मैं बताता हूँ, कुछ भी नही रहने आता है

कुछ भी नही रहता है
कुछ भी नही रह जाता है
कुछ भी नही रहने आता है
मैं बताता हूँ, कुछ भी नही रह पाता है।

पाप से अर्जित धन

हे धर्मात्मन्, तुमने अत्यन्त संयम से काम, क्रोध ,लोभ पर नियन्त्रण रखते हुए धर्म अर्जित किया है पर यह तुम्हे संतोष (अहंकार) तो देता ही न है,मेरे अनुरोध पर भी तुम अपना धर्म त्याग करने के लिये तैयार नहीं हो, अच्छी बात है।
इसै तरह मैंने भी अत्यन्त साहस से तुम्हारी समस्त उपेक्षा के बावजूद मर्यादा तक की परवाह नहीं किये बिना धन अर्जित और संग्रह किया है, यह मुझे संतोष (अहंकार) तो देता ही न है,तुम्हारे अनुरोध पर भी मैं अपना धन त्याग करने के लिये तैयार नहीं हो सकता, मुझे बार बार दान,चन्दा त्याग के लिये उकसाना कहीं तुम्हारे अन्दर छिपे प्रचन्ड लोभ का द्योतक तो नहीं ।

कहीं तुम मुझे धर्म का खरीददार तो नहीं समझ बैठे, लगता तो है तुम धर्म की दुकान खोल बैठै हो।

तुमसे तो मै भला जो खुले आम दुकान करता हूँ, तुम्हारी तरह छिप कर नहीं।

राजन्, आप सुन रहे हैं न। क्यों सब कुछ बेच डालने पर उतारू हैं। सारे राजा, सारे धर्मात्मा की नजर मेरे पाप से अर्जित धन पर क्यों हैं---

Tuesday, 7 May 2013

यूँ बँट कर तो नही रहूँगा।

न जाने क्यूँ मुझे मेरे ही नाम से नफरत हो चली है,
बड़ा चुगलखोर है यह।

इसे छिपा कर जब जब मैं घुमा हूँ,
कई बार जब इसे छोड़ कहीं आता हूँ
तब तुमने भी मझे शायद ईंसान समझा।

हो सकता है गलत समझ थी तुम्हारी।

फिर मेरी फितरत करनी देख,
शैतान या हैवान या अभी भी
इंसान समझना चाहा।

पर निगोड़ा नाम जैसे ही  झाँका दरींचे से
तुम, वे और यहाँ तक की मैं भी
हिन्दू है, मुसलमान ही है समझ चुका था।

मेरे आसपास इंसानी साया तक नहीं रहा
नाम के आते ही वे जज्बात भी गुम थे।

मेरा नाम ,ऐ दुनियावालों वापस ले लो
बिना नाम के ही जी लूँगा

भले ही एक संख्या रहूँ
मजहब की कैद में
चिन्दी-चिन्दी फट कर या फिर
यूँ बँट कर तो नही रहूँगा।

Friday, 3 May 2013

तुम्हारे हाथ में तो खंजर हैं, शिराओं में गरम खून, फौलादी पंजा भी है
मैंने तो नाखूनों, दांतों से थकते लोगों को शिकार करते, लड़ते देखा है।
धुन्ध, अन्धेरा, उमस और गहराती गरमी
अब मझे और बैचैन नहीं करती
मुझे पता चल गया है
कि अंकुराने के लिये यह सब जरुरी है
Samarth aur shaktishali bano ,ek kadam peechhe hato, sir ucha karo. charo aur ghumao, charo aur jitni door dekh sakte ho dekho, ruko, samajh kar apne shikar /lakshya ki aur jhapto.ho sakta hai thoda daurna pade, thake bina shikar ke thakne tak peechha karo- jivan aur adhyatma yahi raste batata hai
धर्मक्षेत्रे वा कुरूक्षेत्रे वा अन्यक्षेत्रे- विवादेन् अलम्
हाँ कहूँ तो है नहीँ, ना भी कहा न जाय
यह सब कूछ द्वन्द्व ही तो है
जिसके कारण वाक्पटु भ्रम फैला जाते है
सदा सच बोलो
पर
... अप्रिय सच मत बोलो
और हाँ, जान कर रखना
सच सदा अप्रिय होता है

महाभारत का कथानक सभी प्रकार से भ्रम फैलाता है
या कह सकते हैं- टैक्टफुल प्रेक्टिकल बनाता है
यदि आप निर्ल्लज्ज नैतिकता का स्वांग धारण कर सकते हो
कथित सफलता के लिये सर्वस्व
सभी मुल्यों सहित त्याग कर डालना
कितना सही है